भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1717

आत्मीयजन उसके प्रति बलपूर्वक व्यवहार करके भी उसकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप सब लोग एकमत होकर—आवश्यकता हो तो इसके केश पकड़कर भी इसे अनुचित मार्गपर जानेसे रोकें और सब प्रकारसे इसकी रक्षा करें॥ १९ ॥

‘उत्तम चरित्ररूपी जलसे परिपूर्ण श्रीरघुनाथरूपी समुद्र इसे डुबो रहा है अथवा यों समझो कि यह श्रीरामरूपी पातालके गहरे गर्तमें गिर रहा है। ऐसी दशामें तुम सब लोगोंको मिलकर इसका उद्धार करना चाहिये॥ २० ॥

‘मैं तो राक्षसोंसहित इस सारे नगरके और सुहृदोंसहित स्वयं महाराजके हितके लिये अपनी यही उत्तम सम्मति देता हूँ कि ‘ये राजकुमार श्रीरामके हाथोंमें मिथिलेशकुमारी सीताको सौंप दें’॥ २१ ॥

‘वास्तवमें सच्चा मन्त्री वही है जो अपने और शत्रु-पक्षके बल-पराक्रमको समझकर तथा दोनों पक्षोंकी स्थिति, हानि और वृद्धिका अपनी बुद्धिके द्वारा विचार करके जो स्वामीके लिये हितकर और उचित हो वही बात कहे’॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४ ॥


* राजाओंमें सात व्यसन माने गये हैं—
वाग्दण्डयोस्तु पारुष्यमर्थदूषणमेव च। पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनं सप्तधा प्रभो॥
(कामन्दक नीतिका वचन गोविन्दराजकी टीका रामायण-भूषणसे) वाणी और दण्डकी कठोरता, धनका अपव्यय, मद्यपान, स्त्री, मृगया और द्यूत—ये राजाके सात प्रकारके व्यसन हैं।