भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1765

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छब्बीसवाँ सर्ग

सारणका रावणको पृथक्-पृथक् वानरयूथपतियोंका परिचय देना

(शुक और) सारणके ये सच्चे और जोशीले शब्द सुनकर रावणने सारणसे कहा— ॥ १ ॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीताको नहीं दूँगा॥ २ ॥

‘सौम्य! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरोंने बहुत तंग किया है। इसीसे भयभीत होकर तुम आज ही सीताको लौटा देना ठीक समझने लगे हो। भला, कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गणमें मुझे जीत सके’॥ ३ १/२ ॥

ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरोंकी सेनाका निरीक्षण करनेके लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फके समान श्वेत रंगकी अट्टालिकापर चढ़ गया॥ ४-५ ॥

उस समय रावण क्रोधसे तमतमा उठा था। उसने उन दोनों गुप्तचरोंके साथ जब समुद्र, पर्वत और वनोंपर दृष्टिपात किया, तब पृथिवीका सारा प्रदेश वानरोंसे भरा दिखायी दिया॥ ६ १/२ ॥

वानरोंकी वह विशाल सेना अपार और असह्य थी। उसे देखकर राजा रावणने सारणसे पूछा— ॥ ७ १/२ ॥

‘सारण! इन वानरोंमें कौन-कौनसे मुख्य हैं? कौन शूरवीर हैं और कौन बलमें बहुत बढ़े-चढ़े हैं?॥ ८ ॥

‘कौन-कौनसे वानर महान् उत्साहसे सम्पन्न होकर युद्धमें आगे-आगे रहते हैं? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियोंके भी यूथपति हैं? सारण! ये सारी बातें मुझे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि उन वानरोंका प्रभाव कैसा है?’॥ ९ १/२ ॥

इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावणका वचन सुनकर मुख्य-मुख्य वानरोंको जाननेवाले सारणने उन मुख्य वानरोंका परिचय देते हुए कहा— ॥ १० १/२ ॥

‘महाराज! यह जो लङ्काकी ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपोंसे घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जनाके अत्यन्त गम्भीर घोषसे परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनोंके