श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1778, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘वनमें दावानलका स्पर्श करके भी वहाँके वृक्ष खड़े रह जायें, यह सम्भव है; परंतु राजदण्डके अधिकारी अपराधी नहीं टिक सकते। वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं॥ १२॥
‘यदि इनके पहलेके उपकारोंको याद करके मेरा क्रोध नरम न पड़ जाता तो शत्रुपक्षकी प्रशंसा करनेवाले इन दोनों पापियोंको मैं अभी मार डालता॥ १३॥
‘अब तुम दोनों मेरी सभामें प्रवेशके अधिकारसे वञ्चित हो। मेरे पाससे चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुँह न दिखाना। मैं तुम दोनोंका वध करना नहीं चाहता; क्योंकि तुम दोनोंके किये हुए उपकारोंको सदा स्मरण रखता हूँ। तुम दोनों मेरे स्नेहसे विमुख और कृतघ्न हो, अतः मरे हुएके ही समान हो’॥ १४॥
उसके ऐसा कहनेपर शुक और सारण बहुत लज्जित हुए और जय-जयकारके द्वारा रावणका अभिनन्दन करके वहाँसे निकल गये॥ १५॥
इसके पश्चात् दशमुख रावणने अपने पास बैठे हुए महोदरसे कहा— ‘मेरे सामने शीघ्र ही गुप्तचरोंको उपस्थित होनेकी आज्ञा दो।’ यह आदेश पाकर निशाचर महोदरने शीघ्र ही गुप्तचरोंको हाजिर होनेकी आज्ञा दी॥ १६॥
राजाकी आज्ञा पाकर गुप्तचर उसी समय विजयसूचक आशीर्वाद दे हाथ जोड़े सेवामें उपस्थित हुए॥ १७॥
वे सभी गुप्तचर विश्वासपात्र, शूरवीर, धीर एवं निर्भय थे। राक्षसराज रावणने उनसे यह बात कही— ‘तुमलोग अभी वानरसेनामें रामका क्या निश्चय है, यह जाननेके लिये तथा गुप्तमन्त्रणामें भाग लेनेवाले जो उनके अन्तरङ्ग मन्त्री हैं और जो लोग प्रेमपूर्वक उनसे मिले हैं— उनके मित्र हो गये हैं; उन सबके भी निश्चित विचार क्या हैं, इसकी जाँच करनेके लिये यहाँसे जाओ॥ १९॥
‘वे कैसे सोते हैं? किस तरह जागते हैं और आज क्या करेंगे?— इन सब बातोंका पूर्णरूपसे अच्छी तरह पता लगाकर लौट आओ॥ २०॥
‘गुप्तचरके द्वारा यदि शत्रुंकी गतिविधिका पता चल जाय तो बुद्धिमान् राजा थोड़े-से ही प्रयत्नके द्वारा युद्धमें उसे धर दबाते और मार भगाते हैं’॥ २१॥
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्षमें भरे हुए गुप्तचरोंने शार्दूलको आगे करके राक्षसराज रावणकी परिक्रमा की॥ २२॥