श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1802, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘नाना प्रकारके बहुत-से भयंकर उत्पातोंको लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसोंके विनाशका ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ॥ २४॥
‘घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन-तर्जनके साथ लङ्कापर सब ओरसे गर्म खूनकी वर्षा कर रहे हैं॥ २५॥
‘घोड़े-हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रुविन्दु झर रहे हैं। दिशाएँ धूल भर जानेसे मलिन हो अब पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं॥ २६॥
मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्काके उपवनमें घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं॥ २७॥
‘सपनेमें काले रंगकी स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुँऽइ सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घरके सामान चुराती हुँऽइ जोर-जोरसे हँसती हैं॥ २८॥
‘घरोंमें जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलि-सामग्रीको कुत्ते खा जाते हैं। गौओंसे गधे और नेवलोंसे चूहे पैदा होते हैं॥ २९॥
‘बाघोंके साथ बिलाव, कुत्तोंके साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्योंके साथ किन्नर समागम करते हैं॥
‘जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैवसे प्रेरित हो राक्षसोंका भावी विनाश सूचित करनेके लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं॥ ३१॥
‘घरोंमें रहनेवाली सारिकाएँ कलहकी इच्छावाले दूसरे पक्षियोंसे चें-चें करती हुँऽइ गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वीपर गिर पड़ती हैं॥ ३२॥
‘पक्षी और मृग सभी सूर्यकी ओर मुँह करके रोते हैं। विकराल, विकट, काले और भूरे रंगके मूँड़ मुड़ाये हुए पुरुषका रूप धारण करके काल समय-समयपर हम सबके घरोंकी ओर देखता है॥ ३३ १/२॥
‘ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानवरूप धारण करके राम होकर आये हैं। जिन्होंने समुद्रमें अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढ़पराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्यमात्र नहीं हैं। रावण! तुम नरराज श्रीरामके साथ संधि कर लो। श्रीरामके अलौकिक कर्मों और लङ्कामें होनेवाले उत्पातोंको जानकर जो कार्य भविष्यमें सुख देनेवाला हो, उसका निश्चय करके वही करो’॥ ३४—३६॥