भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1865

(वे बोले—) 'महाराज! कुमार इन्द्रजित्ने जिन राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको युद्धस्थलमें नागरूपी बाणोंके बन्धनसे बाँधकर हाथ हिलानेमें भी असमर्थ कर दिया था, वे गजराजके समान पराक्रमी दोनों वीर जैसे हाथी रस्सेको तोड़कर स्वतन्त्र हो जायँ, उसी तरह बाणबन्धनसे मुक्त हो समराङ्गणमें खड़े दिखायी देते हैं'॥ १२-१३ ॥

उनका वह वचन सुनकर महाबली राक्षसराज रावण चिन्ता तथा शोकके वशीभूत हो गया और उसका चेहरा उतर गया॥ १४ ॥

(वह मन-ही-मन सोचने लगा—) 'जो विषधर सर्पोंके समान भयंकर, वरदानमें प्राप्त हुए और अमोघ थे तथा जिनका तेज सूर्यके समान था, उन्हींके द्वारा युद्धस्थलमें इन्द्रजित्ने जिन्हें बाँध दिया था, वे मेरे दोनों शत्रु यदि उस अस्त्रबन्धनमें पड़कर भी उससे छूट गये, तब तो अब मैं अपनी सारी सेनाको संशयापन्न ही देखता हूँ॥ १५-१६ ॥

'जिन्होंने पहले युद्धस्थलमें मेरे शत्रुओंके प्राण ले लिये थे, वे अग्नितुल्य तेजस्वी बाण निश्चय ही आज निष्फल हो गये'॥ १७ ॥

ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुआ रावण फुफकारते हुए सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेने लगा और राक्षसोंके बीचमें धूम्राक्ष नामक निशाचरसे बोला— ॥

'भयानक पराक्रमी वीर! तुम राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर वानरोंसहित रामका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ'॥ १९ ॥

बुद्धिमान् राक्षसराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर धूम्राक्षने उसकी परिक्रमा की तथा वह तुरंत राजभवनसे बाहर निकल गया॥ २० ॥

रावणके गृहद्वारपर पहुँचकर उसने सेनापतिसे कहा—'सेनाको उतावलीके साथ शीघ्र तैयार करो। युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको विलम्ब करनेसे क्या लाभ?'॥ २१ ॥

धूम्राक्षकी बात सुनकर रावणकी आज्ञाके अनुसार सेनापतिने जिनके पीछे बहुत बड़ी सेना थी, भारी संख्यामें सैनिकोंको तैयार कर दिया॥ २२ ॥

वे भयानक रूपधारी बलवान् निशाचर प्रास और शक्ति आदि अस्त्रोंमें घण्टे बाँधकर हर्ष और उत्साहसे युक्त हो जोर-जोरसे गर्जते हुए आये और धूम्राक्षको घेरकर खड़े हो गये॥ २३ ॥

उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे। कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर ले रखे थे। गदा-पट्टिश, लोहदण्ड, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश और फरसे लिये बहुतेरे