भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1885

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सत्तावनवाँ सर्ग

प्रहस्तका रावणकी आज्ञासे विशाल सेनासहित युद्धके लिये प्रस्थान

अकम्पनके वधका समाचार पाकर राक्षसराज रावणको बड़ा क्रोध हुआ। उसके मुखपर कुछ दीनता छा गयी और वह मन्त्रियोंकी ओर देखने लगा॥ १ ॥

पहले तो दो घड़ीतक वह कुछ सोचता रहा। फिर उसने मन्त्रियोंके साथ विचार किया और उसके बाद दिनके पूर्वभागमें राक्षसराज रावण स्वयं लङ्काके सब मोरचोंका निरीक्षण करनेके लिये गया॥ २ ॥

राक्षसगणोंसे सुरक्षित और बहुत-सी छावनियोंसे घिरी हुई, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित उस नगरीको राजा रावणने अच्छी तरह देखा॥ ३ ॥

लङ्कापुरी चारों ओरसे शत्रुओंद्वारा घेर ली गयी थी। यह देखकर राक्षसराज रावणने अपने हितैषी युद्धकलाकोविद प्रहस्तसे यह समयोचित बात कही— ॥ ४ ॥

‘युद्धविशारद वीर! नगरके अत्यन्त निकट शत्रुओंकी सेना छावनी डाले पड़ी है, इसीलिये सारा नगर सहसा व्यथित हो उठा है। अब मैं दूसरे किसीके युद्ध करनेसे इसका छुटकारा होता नहीं देखता हूँ॥ ५ ॥

‘अब तो इस तरहके युद्धका भार मैं, कुम्भकर्ण, मेरे सेनापति तुम, बेटा इन्द्रजित् अथवा निकुम्भ ही उठा सकते हैं॥ ६ ॥

‘अतः तुम शीघ्र ही सेना लेकर विजयके लिये प्रस्थान करो और जहाँ ये सब वानर जुटे हुए हैं, वहाँ जाओ॥ ७ ॥

‘तुम्हारे निकलते ही सारी वानरसेना तुरंत विचलित हो उठेगी और गर्जते हुए राक्षसशिरोमणियोंका सिंहनाद सुनकर भाग खड़ी होगी॥ ८ ॥

‘वानरलोग बड़े चञ्चल, ढीठ और डरपोक होते हैं, जैसे हाथी सिंहकी गर्जना नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे वानर तुम्हारा सिंहनाद नहीं सह सकेंगे॥ ९ ॥

‘प्रहस्त! जब वानरसेना भाग जायगी, तब कोई सहारा न रहनेके कारण लक्ष्मणसहित श्रीराम विवश होकर तुम्हारे अधीन हो जायँगे॥ १० ॥