श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1968, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनहत्तरवाँ सर्ग
रावणके पुत्रों और भाइयोंका युद्धके लिये जाना और नरान्तकका अङ्गदके द्वारा वध
दुरात्मा रावण जब शोकसे पीड़ित हो इस प्रकार विलाप करने लगा, तब त्रिशिराने कहा—॥ १ ॥
‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हमारे मझले चाचा, जो इस समय युद्धमें मारे गये हैं, ऐसे ही महान् पराक्रमी थे; परंतु आप जिस प्रकार रोते-कलपते हैं, उस तरह श्रेष्ठ पुरुष किसीके लिये विलाप नहीं करते हैं॥ २ ॥
‘प्रभो! निश्चय आप अकेले ही तीनों लोकोंसे भी लोहा लेनेमें समर्थ हैं; फिर इस तरह साधारण पुरुषकी भाँति क्यों अपने-आपको शोकमें डाल रहे हैं?॥ ३ ॥
‘आपके पास ब्रह्माजीकी दी हुई शक्ति, कवच, धनुष तथा बाण हैं; साथ ही मेघ-गर्जनाके समान शब्द करनेवाला रथ भी है, जिसमें एक हजार गदहे जोते जाते हैं॥ ४ ॥
‘आपने एक ही शस्त्रसे देवताओं और दानवोंको अनेक बार पछाड़ा है, अतः सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होनेपर आप रामको भी दण्ड दे सकते हैं॥ ५ ॥
‘अथवा महाराज! आपकी इच्छा हो तो यहीं रहें। मैं स्वयं युद्धके लिये जाऊँगा और जैसे गरुड़ सर्पोंका संहार करते हैं, उसी तरह मैं आपके शत्रुओंको जड़से उखाड़ फेंकूँगा॥ ६ ॥
‘जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको और भगवान् विष्णुने नरकासुरको* मार गिराया था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें आज मेरे द्वारा मारे जाकर राम सदाके लिये सो जायँगे’॥ ७ ॥
त्रिशिराकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणको इतना संतोष हुआ कि वह अपना नया जन्म हुआ-सा मानने लगा। कालसे प्रेरित होकर ही उसकी ऐसी बुद्धि हो गयी॥ ८ ॥
त्रिशिराका उपर्युक्त कथन सुनकर देवान्तक, नरान्तक और तेजस्वी अतिकाय—ये तीनों युद्धके लिये उत्साहित हो गये॥ ९ ॥
‘मैं युद्धके लिये जाऊँगा, मैं जाऊँगा’ ऐसा कहते और गर्जते हुए वे तीनों श्रेष्ठ निशाचर युद्धके लिये तैयार हो गये। रावणके वे वीर पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी थे॥
वे सब-के-सब आकाशमें विचरण करनेवाले, मायाविशारद, रणदुर्मद तथा देवताओंका भी दर्प दलन करनेवाले थे॥ ११ ॥