भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1976

उस राक्षसकी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित हो उठे॥ ९२ ॥

फिर अङ्गदने पर्वत-शिखरके समान अपना मुक्का ताना, जिसका वेग मृत्युके समान था। फिर उन महात्मा वालिकुमारने उससे नरान्तककी छातीमें प्रहार किया॥

मुक्केके आघातसे नरान्तकका हृदय विदीर्ण हो गया। वह मुँहसे आगकी ज्वाला-सी उगलने लगा। उसके सारे अङ्ग लहूलुहान हो गये और वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ९४ ॥

वालिकुमारके द्वारा युद्धस्थलमें उत्तम पराक्रमी नरान्तकके मारे जानेपर उस समय आकाशमें देवताओंने और भूतलपर वानरोंने बड़े जोरसे हर्षनाद किया॥ ९५ ॥

अङ्गदने श्रीरामचन्द्रजीके मनको अत्यन्त हर्ष प्रदान करनेवाला वह परम दुष्कर पराक्रम किया था। उससे श्रीरामचन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ। तत्पश्चात् भीषण कर्म करनेवाले अङ्गद पुनः युद्धके लिये हर्ष और उत्साहसे भर गये॥ ९६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९ ॥


* यहाँ जिस नरकासुरका नाम आया है, वह विप्रचित्ति नामक दानवके द्वारा सिंहिकाके गर्भसे उत्पन्न हुए वातापि आदि सात पुत्रोंमेंसे एक था। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—वातापि, नमुचि, इल्वल, सृमर, अन्धक, नरक और कालनाभ। भगवान् श्रीकृष्णने द्वापरमें जिस भूमिपुत्र नरकासुरका वध किया था, वह यहाँ उल्लिखित नरकासुरसे भिन्न था। त्रिशिरा और रावणके समयमें तो उसका जन्म ही नहीं हुआ था।

१. रथके धुरेपर कूबरके आधाररूपसे स्थापित काष्ठविशेषको अनुकर्ष कहते हैं।
२. कूबर उस काष्ठको कहते हैं, जिसपर जुआ रखा जाता है। गाड़ीके हरसोंको भी प्राचीनकालमें कूबर कहा जाता था।