भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2068, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2068

‘उस महायुद्धमें वज्र एवं अशनिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा मैंने तुम दोनों भाइयोंको पहले धरतीपर सुला दिया था। तुम दोनों अपने अग्रगामी सैनिकोंके साथ मूर्च्छित होकर पड़े थे॥ ४५ ॥

‘अथवा मालूम होता है कि तुम्हें उन सब बातोंकी याद नहीं आ रही है। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि तुम यमलोकमें जाना चाहते हो। इसीलिये तुम मुझे पराजित करनेकी इच्छा रखते हो॥ ४६ ॥

‘यदि पहले युद्धमें तुमने मेरा पराक्रम नहीं देखा है तो आज तुम्हें दिखा दूँगा। इस समय सुस्थिरभावसे खड़े रहो’॥ ४७ ॥

ऐसा कहकर तीखी धारवाले सात बाणोंसे उसने लक्ष्मणको घायल कर दिया और दस उत्तम सायकोंद्वारा हनुमान्‌जीपर प्रहार किया॥ ४८ ॥

तत्पश्चात् दूने रोषसे भरे हुए उस पराक्रमी निशाचरने अच्छी तरहसे छोड़े गये सौ बाणोंद्वारा विभीषणको क्रोधपूर्वक क्षत-विक्षत कर दिया॥ ४९ ॥

इन्द्रजित्द्वारा किये गये इस पराक्रमको देखकर श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने उसकी कोई परवा नहीं की और हँसते-हँसते कहा— ‘यह तो कुछ नहीं है’॥ ५० ॥

साथ ही उन नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने मुखपर भयकी छायातक नहीं आने दी। उन्होंने युद्धस्थलमें कुपित हो भयंकर बाण हाथमें लिये और उन्हें रावणकुमारको लक्ष्य करके चला दिया॥ ५१ ॥

फिर वे बोले— ‘निशाचर! रणभूमिमें आये हुए शूरवीर इस तरह प्रहार नहीं करते। तुम्हारे ये बाण बहुत हल्के और कमजोर हैं। इनसे कष्ट नहीं होता— सुख ही मिलता है॥ ५२ ॥

‘युद्धकी इच्छा रखनेवाले शूरवीर समराङ्गणमें इस तरह युद्ध नहीं करते हैं।’ ऐसा कहते हुए धनुर्धर वीर लक्ष्मणने उस राक्षसपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥

लक्ष्मणके बाणोंसे इन्द्रजित्का महान् कवच, जो सोनेका बना हुआ था, टूटकर रथकी बैठकमें बिखर गया, मानो आकाशसे ताराओंका समूह टूटकर गिर पड़ा हो॥ ५४ ॥

कवच कट जानेपर नाराचोंके प्रहारसे वीर इन्द्रजित्के सारे अङ्गोंमें घाव हो गये। वह समराङ्गणमें रक्तसे रञ्जित हो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति दिखायी देने लगा॥ ५५ ॥

तब भयानक पराक्रमी वीर रावणकुमारने अत्यन्त कुपित हो समरभूमिमें लक्ष्मणको सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया॥ ५६ ॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण · पृष्ठ 2068, कुल 2621 में से · BharatKosha