भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2069

इससे लक्ष्मणका भी दिव्य एवं विशाल कवच छिन्न-भिन्न हो गया। वे दोनों शत्रुदमन वीर एक-दूसरेके प्रहारका जवाब देने लगे॥ ५७ ॥

वे बारंबार हाँफते हुए भयानक युद्ध करने लगे। युद्धस्थलमें बाणोंके आघातसे दोनोंके सारे अङ्ग क्षतवि क्षत हो गये थे। अतः वे दोनों सब ओरसे लहूलुहान हो गये॥ ५८ ॥

दोनों वीर दीर्घकालतक एक-दूसरेपर पैने बाणोंका प्रहार करते रहे। दोनों ही महामनस्वी तथा युद्धकी कलामें निपुण थे। दोनों भयंकर पराक्रम प्रकट करते थे और अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे॥ ५९ ॥

दोनोंके शरीर बाण-समूहोंसे व्याप्त थे। दोनोंके ही कवच और ध्वज कट गये थे। जैसे दो झरने जल बहा रहे हों, उसी तरह वे दोनों अपने शरीरसे गरम-गरम रक्त बहा रहे थे॥ ६० ॥

दोनों ही भयंकर गर्जनाके साथ बाणोंकी घोर वर्षा कर रहे थे, मानो प्रलयकालके दो नील मेघ आकाशमें जलकी धारा बरसा रहे हों॥ ६१ ॥

वहाँ जूझते हुए उन दोनों वीरोंका बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया; परंतु वे दोनों न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई॥ ६२ ॥

दोनों ही अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे और बारंबार अपने अस्त्रोंका प्रदर्शन करते थे। उन्होंने आकाशमें छोटे-बड़े बाणोंका जाल-सा बाँध दिया॥ ६३ ॥

वे मनुष्य और राक्षस—दोनों वीर बड़ी फुर्तीके साथ अद्भुत और सुन्दर ढंगसे बाणोंका प्रहार करते थे। उनके बाण चलानेकी कलामें कोई दोष नहीं दिखायी देता था। वे दोनों घोर घमासान युद्ध कर रहे थे॥ ६४ ॥

बाण चलाते समय उन दोनोंकी हथेली और प्रत्यञ्चाका भयंकर एवं तुमुल नाद पृथक्-पृथक् सुनायी देता था, जो भयंकर वज्रपातकी आवाजके समान श्रोताओंके हृदयमें कम्प उत्पन्न कर देता था॥ ६५ ॥

उन दोनों रणोन्मत्त वीरोंका वह शब्द आकाशमें परस्पर टकराते हुए दो महाभयंकर मेघोंकी गड़गड़ाहटके समान सुशोभित होता था॥ ६६ ॥

वे दोनों बलवान् योद्धा सोनेके पंखवाले नाराचोंसे घायल हो शरीरसे खून बहा रहे थे। दोनों ही यशस्वी थे और अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्न कर रहे थे॥ ६७ ॥