श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार सुग्रीवकी मारसे जब सब ओर राक्षसोंका विनाश होने लगा तथा वे भागने और आर्तनाद करते हुए पृथ्वीपर गिरने लगे, तब विरूपाक्ष नामक दुर्जय राक्षस हाथमें धनुष ले अपना नाम घोषित करता हुआ रथसे कूद पड़ा और हाथीकी पीठपर जा चढ़ा॥ १३-१४ ॥
उस हाथीपर चढ़कर महाबली विरूपाक्षने बड़ी भयानक आवाजमें गर्जना की और वानरोंपर वेगपूर्वक धावा किया॥ १५ ॥
उसने सेनाके मुहानेपर सुग्रीवको लक्ष्य करके बड़े भयंकर बाण छोड़े और डटे हुए राक्षसोंका हर्ष बढ़ाकर उन्हें स्थिरतापूर्वक स्थापित किया॥ १६ ॥
उस राक्षसके पैने बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए वानरराज सुग्रीवने महान् क्रोधसे भरकर भीषण गर्जना की और विरूपाक्षको मार डालनेका विचार किया॥ १७ ॥
शूरवीर तो वे थे ही, सुन्दर ढंगसे युद्ध करना भी जानते थे; अतः एक वृक्ष उखाड़कर आगे बढ़े और अपने सामने खड़े हुए उसके विशाल हाथीपर उन्होंने उस वृक्षको दे मारा॥ १८ ॥
सुग्रीवके प्रहारसे घायल हो वह महान् गजराज एक धनुष पीछे हटकर बैठ गया और पीड़ासे आर्तनाद करने लगा॥ १९ ॥
पराक्रमी राक्षस विरूपाक्ष उस घायल हाथीकी पीठसे तुरंत कूद पड़ा और ढाल-तलवार ले शीघ्रतापूर्वक अपने शत्रु सुग्रीवकी ओर बढ़ा। सुग्रीव एक स्थानपर स्थिरतापूर्वक खड़े थे। वह उन्हें फटकारता हुआ-सा उनके पास जा पहुँचा॥ २०-२१ ॥
यह देख सुग्रीवने एक बहुत बड़ी शिला हाथमें ली, जो मेघके समान काली थी। उसे उन्होंने विरूपाक्षके शरीरपर क्रोधपूर्वक दे मारा॥ २२ ॥
उस शिलाको अपने ऊपर आती देख उस परम पराक्रमी राक्षसशिरोमणि विरूपाक्षने पीछे हटकर आत्मरक्षा की और सुग्रीवपर तलवार चलायी॥ २३ ॥
उस बलवान् निशाचरकी तलवारसे घायल होकर वानरराज सुग्रीव मूर्च्छित होकर थोड़ी देर धरतीपर पड़े रहे॥ २४ ॥
फिर सहसा उछलकर उन्होंने उस महासमरमें मुट्ठी बाँधकर विरूपाक्षकी छातीपर वेगपूर्वक एक मुक्का मारा॥ २५ ॥
उनके मुक्केकी चोट खाकर निशाचर विरूपाक्षका क्रोध और बढ़ गया और उसने सेनाके मुहानेपर उसी तलवारसे सुग्रीवके कवचको काट गिराया; साथ ही उसके पैरोंका आघात पाकर