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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2109

वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २६ १/२ ॥

गिरे हुए सुग्रीव पुनः उठकर खड़े हो गये और उन्होंने उस राक्षसको वज्रके समान भीषण शब्द करनेवाले थप्पड़से मारा॥ २७ १/२ ॥

सुग्रीवके चलाये हुए उस थप्पड़का वार वह राक्षस अपने युद्धकौशलसे बचा गया और उसने सुग्रीवकी छातीपर एक घूसा मारा॥ २८ १/२ ॥

अब तो वानरराज सुग्रीवके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने देखा कि राक्षसने मेरे प्रहारको व्यर्थ कर दिया और अपने ऊपर उसका स्पर्श नहीं होने दिया। तब वे विरुपाक्षपर प्रहार करनेका अवसर देखने लगे॥ २९-३० ॥

तदनन्तर सुग्रीवने विरुपाक्षके ललाटपर क्रोधपूर्वक दूसरा महान् थप्पड़ मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान दुःसह था। उससे आहत होकर विरुपाक्ष पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसका सारा शरीर खूनसे भीग गया और वह समस्त इन्द्रिय-गोलकोंसे उसी प्रकार रक्त वमन करने लगा, जैसे झरनेसे जल गिर रहा हो॥

उस राक्षसकी आँखें क्रोधसे घूम रही थीं। वह फेनयुक्त रुधिरमें डूबा हुआ था। वानरोंने देखा, विरुपाक्ष अत्यन्त विरुपाक्ष (कुरूप नेत्रवाला और भयंकर) हो गया है। खूनसे लथपथ हो छटपटाता करवटें बदलता तथा करुणाजनक आर्तनाद करता है॥ ३३-३४ ॥

इस प्रकार वे दोनों वेगशाली वानरों और राक्षसोंके सैन्य-समुद्र मर्यादा तोड़कर बहनेवाले दो भयानक महासागरोंके समान परस्पर संयुक्त हो युद्धभूमिमें महान् कोलाहल करने लगे॥ ३५ ॥

वानरराज सुग्रीवके द्वारा महाबली विरुपाक्षका वध हुआ देख वानरों और राक्षसोंकी सेनाएँ एकत्र हो बढ़ी हुई गङ्गाके समान उद्वेलित हो गयीं (एक ओर आनन्दजनित कोलाहल था तो दूसरी ओर शोकके कारण आर्तनाद हो रहा था)॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९६ ॥