श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्तानबेवाँ सर्ग
सुग्रीवके साथ महोदरका घोर युद्ध तथा वध
उस महासमरमें वे दोनों ओरकी सेनाएँ परस्परकी मारकाटसे प्रचण्ड ग्रीष्मऋतुमें सूखते हुए दो तालाबोंकी तरह शीघ्र ही क्षीण हो चलीं॥ १ ॥
अपनी सेनाके विनाश और विरूपाक्षके वधसे राक्षसराज रावणका क्रोध दूना बढ़ गया॥ २ ॥
वानरोंकी मारसे अपनी सेनाको क्षीण हुँऽइ देख दैवके उलट-फेरपर दृष्टिपात करके युद्धस्थलमें उसे बड़ी व्यथा हुँऽइ॥ ३ ॥
उसने पास ही खड़े हुए महोदरसे कहा— ‘महाबाहो! इस समय मेरी विजयकी आशा तुम्हारे ऊपर ही अवलम्बित है॥ ४ ॥
‘वीर! आज अपना पराक्रम दिखाओ और शत्रुसेनाका वध करो। यही स्वामीके अन्नका बदला चुकानेका समय है। अतः अच्छी तरह युद्ध करो’॥ ५ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर राक्षसराज महोदरने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और जैसे पतङ्ग आगमें कूदता है, उसी प्रकार उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया॥ ६ ॥
सेनामें प्रवेश करके तेजस्वी और महाबली महोदरने स्वामीकी आज्ञासे प्रेरित हो अपने पराक्रमद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया॥ ७ ॥
वानर भी बड़े शक्तिशाली थे। वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ लेकर शत्रु की भयंकर सेनामें घुस गये और समस्त राक्षसोंका संहार करने लगे॥ ८ ॥
महोदरने अत्यन्त कुपित होकर अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा उस महायुद्धमें वानरोंके हाथ-पैर और जाँघें काट डालीं॥ ९ ॥
राक्षसोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सब वानर दसों दिशाओंमें भागने लगे। कितने ही सुग्रीवकी शरणमें गये॥ १० ॥
वानरोंकी विशाल सेनाको समरभूमिसे भागती देख सुग्रीवने पास ही खड़े हुए महोदरपर आक्रमण किया॥ ११ ॥