श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2165, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें॥
परम पराक्रमी राजकुमार श्रीरामके ऐसा कहनेपर शोकसंतप्त हुए विभीषणने उनसे अपने भाईके लिये हितकर बात कही—॥ २० ॥
‘भगवन्! पूर्वकालमें युद्धके अवसरोंपर समस्त देवताओं तथा इन्द्रने भी जिसे कभी पीछे नहीं हटाया था, वही रावण आज रणभूमिमें आपसे टक्कर लेकर उसी तरह शान्त हो गया, जैसे समुद्र अपनी तटभू-मितक जाकर शान्त हो जाता है॥ २१ ॥
‘इसने याचकोंको दान दिये, भोग भोगे और भृत्योंका भरण-पोषण किया है। मित्रोंको धन अर्पित किये और शत्रुओंसे वैरका बदला लिया॥ २२ ॥
‘यह रावण अग्निहोत्री, महातपस्वी, वेदान्तवेत्ता तथा यज्ञ-यागादि कर्मोंमें श्रेष्ठ शूर—परम कर्मठ रहा है। अब यह प्रेतभावको प्राप्त हुआ है, अतः अब मैं ही आपकी कृपासे इसका प्रेत-कृत्य करना चाहता हूँ’॥
विभीषणके करुणाजनक वचनोंद्वारा अच्छी तरह समझाये जानेपर उदारचेता राजकुमार महात्मा श्रीरामने उन्हें रावणके लिये स्वर्गादि उत्तम लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला अन्त्येष्टि-कर्म करनेकी आज्ञा दी॥ २४ ॥
वे बोले—‘विभीषण! वैर जीवन-कालतक ही रहता है। मरनेके बाद उस वैरका अन्त हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अतः अब तुम इसका संस्कार करो। इस समय यह जैसे तुम्हारे स्नेहका पात्र है, उसी तरह मेरा भी स्नेहभाजन है’॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०९ ॥