श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2312, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंद्रहवाँ सर्ग
मणिभद्र तथा कुबेरकी पराजय और रावणद्वारा पुष्पकविमानका अपहरण
‘(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) धनाध्यक्षोंने देखा, हजारों यक्षप्रवर भयभीत होकर भाग रहे हैं; तब उन्होंने मणिभद्र नामक एक महायक्षसे कहा— ॥ १ ॥
‘यक्षप्रवर! रावण पापात्मा एवं दुराचारी है, तुम उसे मार डालो और युद्धमें शोभा पानेवाले वीर यक्षोंको शरण दो—उनकी रक्षा करो’॥ २ ॥
महाबाहु मणिभद्र अत्यन्त दुर्जय वीर थे। कुबेरकी उक्त आज्ञा पाकर वे चार हजार यक्षोंकी सेना साथ ले फाटकपर गये और राक्षसोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ३ ॥
उस समय यक्षयोद्धा गदा, मूसल, प्रास, शक्ति, तोमर तथा मुद्गरोंका प्रहार करते हुए राक्षसोंपर टूट पड़े॥ ४ ॥
वे घोर युद्ध करते हुए बाज पक्षीकी तरह तीव्र गतिसे सब ओर विचरने लगे। कोऽइ कहता ‘मुझे युद्धका अवसर दो।’ दूसरा बोलता—‘मैं यहाँसे पीछे हटना नहीं चाहता।’ फिर तीसरा बोल उठता—‘मुझे अपना हथियार दो’॥ ५ ॥
उस तुमुल युद्धको देखकर देवता, गन्धर्व तथा ब्रह्मवादी ऋषि भी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये थे॥ ६ ॥
उस रणभूमिमें प्रहस्तने एक हजार यक्षोंका संहार कर डाला। फिर महोदरने दूसरे एक सहस्र प्रशंसनीय यक्षोंका विनाश किया॥ ७ ॥
राजन्! उस समय कुपित हुए रणोत्सुक मारीचने पलक मारते-मारते शेष दो हजार यक्षोंको धराशायी कर दिया॥ ८ ॥
पुरुषसिंह! कहाँ यक्षोंका सरलतापूर्वक युद्ध? और कहाँ राक्षसोंका मायामय संग्राम? वे अपने मायाबलके भरोसे ही यक्षोंकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए॥ ९ ॥
उस महासमरमें धूम्राक्षने आकर क्रोधपूर्वक मणिभद्रकी छातीमें मूसलका प्रहार किया; किंतु इससे वे विचलित नहीं हुए॥ १० ॥
फिर मणिभद्रने भी गदा घुमाकर उसे राक्षस धूम्राक्षके मस्तकपर दे मारा। उसकी चोटसे व्याकुल हो धूम्राक्ष धरतीपर गिर पड़ा॥ ११ ॥