श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘यह शरीर क्षणभङ्गुर है। इसे पाकर जो तपका उपार्जन नहीं करता, वह मूर्ख मरनेके बाद जब उसे अपने दुष्कर्मोंका फल मिलता है, पश्चात्ताप करता है॥
‘धर्मसे राज, धन और सुखकी प्राप्ति होती है। अधर्मसे केवल दुःख ही भोगना पड़ता है, अतः सुखके लिये धर्मका आचरण करे, पापको सर्वथा त्याग दे॥
‘पापका फल केवल दुःख है और उसे स्वयं ही यहाँ भोगना पड़ता है; इसलिये जो मूढ़ पाप करेगा, वह मानो स्वयं ही अपना वध कर लेगा॥ २४॥
‘किसी भी दुर्बुद्धि पुरुषको (शुभकर्मका अनुष्ठान और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना) स्वेच्छामात्रसे उत्तम बुद्धिकी प्राप्ति नहीं होती। वह जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है॥ २५॥
‘संसारके पुरुषोंको समृद्धि, सुन्दर रूप, बल, वैभव, वीरता तथा पुत्र आदिकी प्राप्ति पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे ही होती है॥ २६॥
‘इसी प्रकार अपने दुष्कर्मोंके कारण तुम्हें भी नरकमें जाना पड़ेगा; क्योंकि तुम्हारी बुद्धि ऐसी पापासक्त हो रही है। दुराचारियोंसे बात नहीं करना चाहिये, यही शास्त्रोंका निर्णय है; अतः मैं भी अब तुमसे कोई बात नहीं करूँगा’॥ २७॥
इसी तरहकी बात उन्होंने रावणके मन्त्रियोंसे भी कही। फिर उनपर शस्त्रोंद्वारा प्रहार किया। इससे आहत होकर वे मारीच आदि सब राक्षस युद्धसे मुँह मोड़कर भाग गये॥ २८॥
तदनन्तर महामना यक्षराज कुबेरने अपनी गदासे रावणके मस्तकपर प्रहार किया। उससे आहत होकर भी वह अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ॥ २९॥
श्रीराम! तत्पश्चात् वे दोनों यक्ष और राक्षस— कुबेर तथा रावण दोनों उस महासमरमें एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे; परंतु दोनोंमेंसे कोई भी न तो घबराता था, न थकता ही था॥ ३०॥
उस समय कुबेरने रावणपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, परंतु राक्षसराज रावणने वारुणास्त्रके द्वारा उनके उस अस्त्रको शान्त कर दिया॥ ३१॥
तत्पश्चात् उस राक्षसराजने राक्षसी मायाका आश्रय लिया और कुबेरका विनाश करनेके लिये लाखों रूप धारण कर लिया॥ ३२॥
उस समय दशमुख रावण बाघ, सूअर, मेघ, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, यक्ष और दैत्य सभी रूपोंमें दिखायी देने लगा॥ ३३॥