भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तैंतीसवाँ सर्ग

पुलस्त्यजीका रावणको अर्जुनकी कैदसे छुटकारा दिलाना

रावणको पकड़ लेना वायुको पकड़नेके समान था। धीरे-धीरे यह बात स्वर्गमें देवताओंके मुखसे पुलस्त्यजीने सुनी॥ १ ॥

यद्यपि वे महर्षि महान् धैर्यशाली थे तो भी संतानके प्रति होनेवाले स्नेहके कारण कृपापरवश हो गये और माहिष्मती नरेशसे मिलनेके लिये भूतलपर चले आये॥ २ ॥

उनका वेग वायुके समान था और गति मनके समान, वे ब्रह्मर्षि वायुपथका आश्रय ले माहिष्मतीपुरीमें आ पहुँचे॥ ३ ॥

जैसे ब्रह्माजी इन्द्रकी अमरावतीपुरीमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार पुलस्त्यजीने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई और अमरावतीके समान शोभासे सम्पन्न माहिष्मती नगरीमें प्रवेश किया॥ ४ ॥

आकाशसे उतरते समय वे पैरोंसे चलकर आते हुए सूर्यके समान जान पड़ते थे। अत्यन्त तेजके कारण उनकी ओर देखना बहुत ही कठिन जान पड़ता था। अर्जुनके सेवकोंने उन्हें पहचानकर राजा अर्जुनको उनके शुभागमनकी सूचना दी॥ ५ ॥

सेवकोंके कहनेसे जब हैहयराजको यह पता चला कि पुलस्त्यजी पधारे हैं, तब वे सिरपर अञ्जलि बाँधे उन तपस्वी मुनिकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये॥ ६ ॥

राजा अर्जुनके पुरोहित अर्घ्य और मधुपर्क आदि लेकर उनके आगे-आगे चले, मानो इन्द्रके आगे बृहस्पति चल रहे हों॥ ७ ॥

वहाँ आते हुए वे महर्षि उदित होते हुए सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे। उन्हें देखकर राजा अर्जुन चकित रह गया। उसने उन ब्रह्मर्षिके चरणोंमें उसी तरह आदरपूर्वक प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीके आगे मस्तक झुकाते हैं॥ ८ ॥

ब्रह्मर्षिको पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ समर्पित करके राजाधिराज अर्जुनने हर्षगद्गद वाणीमें पुलस्त्यजीसे कहा— ॥ ९ ॥

‘द्विजेन्द्र! आपका दर्शन परम दुर्लभ है, तथापि आज मैं आपके दर्शनका सुख उठा रहा हूँ। इस प्रकार यहाँ पधारकर आपने इस माहिष्मतीपुरीको अमरावतीपुरीके समान गौरवशालिनी