श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउग्र तेजस्वी अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ विनयपूर्वक उन महर्षिसे इस प्रकार कहा— ॥ ५४ ॥
‘मुनीश्वर! आज मुझपर देवता, पितर और पितामह आदि विशेषरूपसे संतुष्ट हैं। बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोगोंको तो आप-जैसे महात्माओंके दर्शनसे ही सदा संतोष है॥ ५५ ॥
‘मेरे मनमें एक इच्छाका उदय हुआ है, अतः मैं यह सूचित करनेयोग्य बात आपकी सेवामें निवेदन कर रहा हूँ। मुझपर अनुग्रह करके आपलोगोंको मेरे उस अभीष्ट कार्यको पूरा करना होगा॥ ५६ ॥
‘मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियोंको अपने-अपने कार्योंमें लगाकर मैं आप सत्पुरुषोंके प्रभावसे यज्ञोंका अनुष्ठान करूँ॥ ५७ ॥
‘मेरे उन यज्ञोंमें आप महान् शक्तिशाली महात्मा मुझपर अनुग्रह करनेके लिये नित्य सदस्य बने रहें॥ ५८ ॥
‘आप तपस्यासे निष्पाप हो चुके हैं। मैं आपलोगोंका आश्रय लेकर सदा संतुष्ट एवं पितरोंसे अनुगृहीत होऊँगा॥ ५९ ॥
‘यज्ञ-आरम्भके समय सब लोग एकत्र होकर निरन्तर यहाँ आते रहें।’ श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले अगस्त्य आदि महर्षि उनसे ‘एवमस्तु (ऐसा ही होगा)’ कहकर वहाँसे जानेको उद्यत हुए॥ ६०½ ॥
इस प्रकार बातचीत करके सब ऋषि जैसे आये थे, वैसे चले गये। इधर श्रीरामचन्द्रजी विस्मित होकर उन्हीं बातोंपर विचार करते रहे॥ ६१½ ॥
तदनन्तर सूर्यास्त होनेपर राजाओं और वानरोंको विदा करके नरेशोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक संध्योपासना की और रात होनेपर वे अन्तःपुरमें पधारे॥ ६२-६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥