श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘मैं तो उसके वधमें निमित्तमात्र बना हूँ। वास्तवमें तो आपलोगोंके तेजसे ही पुत्र, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा सेवकगणोंके सहित रावण युद्धमें मारा गया है॥ २४½ ॥
‘वनसे जनकराजनन्दिनी सीताके अपहरणका समाचार सुनकर महात्मा भरतने आपलोगोंको यहाँ बुलाया था॥ २५½ ॥
‘आप सभी महामना भूपाल राक्षसोंपर आक्रमण करनेके लिये उद्योगशील थे। तबसे आजतक यहाँ आपलोगोंका बहुत समय व्यतीत हो गया है। अतः अब मुझे आपलोगोंका अपने नगरको लौट जाना ही उचित जान पड़ता है’॥ २६½ ॥
इसपर राजाओंने अत्यन्त हर्षसे भरकर कहा— ‘श्रीराम! आप विजयी हुए और अपने राज्यपर भी प्रतिष्ठित हो गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २७½ ॥
‘हमारे सौभाग्यसे ही आप सीताको लौटा लाये और उस प्रबल शत्रुको परास्त कर दिया। श्रीराम! यही हमारा सबसे बड़ा मनोरथ है और यही हमारे लिये सबसे बढ़कर प्रसन्नताकी बात है कि आज हमलोग आपको विजयी देख रहे हैं तथा आपकी शत्रु-मण्डली मारी जा चुकी है॥ २८-२९ ॥
‘प्रशंसनीय श्रीराम! आप जो हमलोगोंकी प्रशंसा कर रहे हैं, यह आपहीके योग्य है। हम ऐसी प्रशंसा करनेकी कला नहीं जानते हैं॥ ३० ॥
‘अब हम आज्ञा चाहते हैं। अपनी पुरीको जायँगे। जिस प्रकार आप सदा हमारे हृदयमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार हे महाबाहो! जिसमें हमलोग आपके प्रति प्रेमसे युक्त रहकर आपके हृदयमें बसे रहें, ऐसी प्रीति आपकी हमपर सदा बनी रहनी चाहिये।’ तब श्रीरघुनाथजीने हर्षसे भरे हुए उन राजाओंसे कहा— ‘अवश्य ऐसा ही होगा’॥ ३१-३२ ॥
तत्पश्चात् जानेके लिये उत्सुक हो सबने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा— ‘भगवन्! अब हम जा रहे हैं।’ इस तरह श्रीरामसे सम्मानित हो वे सब राजा अपने-अपने देशको चले गये॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥