श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2428, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंइकतालीसवाँ सर्ग
कुबेरके भेजे हुए पुष्पकविमानका आना और श्रीरामसे पूजित एवं अनुगृहीत होकर अदृश्य हो जाना, भरतके द्वारा श्रीरामराज्यके विलक्षण प्रभावका वर्णन
रीछों, वानरों और राक्षसोंको विदा करके भाइयोंसहित सुख-स्वरूप महाबाहु श्रीराम सुख और आनन्दपूर्वक वहाँ रहने लगे॥ १ ॥
एक दिन अपराह्नकालमें (दोपहरके बाद) अपने भाइयोंके साथ बैठे हुए महाप्रभु श्रीरघुनाथजीने आकाशसे यह मधुर वाणी सुनी—॥ २ ॥
‘सौम्य श्रीराम! आप मेरी ओर प्रसन्नतापूर्ण मुखसे दृष्टिपात करनेकी कृपा करें। प्रभो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं कुबेरके भवनसे लौटा हुआ पुष्पकविमान हूँ॥ ३ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा मानकर मैं कुबेरकी सेवाके लिये उनके भवनमें गया था; परंतु उन्होंने मुझसे कहा—॥ ४ ॥
‘विमान! महात्मा महाराज श्रीरामने युद्धमें दुर्धर्ष राक्षसराज रावणको मारकर तुम्हें जीता है॥ ५ ॥
‘पुत्रों, बन्धु-बान्धवों तथा सेवकगणोंसहित उस दुरात्मा रावणके मारे जानेसे मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ ६ ॥
‘सौम्य! इस तरह परमात्मा श्रीरामने लङ्कामें रावणके साथ-साथ तुमको भी जीत लिया है; अतः मैं आज्ञा देता हूँ, तुम उन्हींकी सवारीमें रहो॥ ७ ॥
‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं। तुम उनकी सवारीके काम आओ— यह मेरी सबसे बड़ी कामना है। इसलिये तुम निश्चिन्त होकर जाओ’॥ ८ ॥
‘इस प्रकार मैं महात्मा कुबेरकी आज्ञा पाकर ही आपके पास आया हूँ, अतः आप मुझे निःशङ्क होकर ग्रहण करें॥ ९ ॥
‘मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हूँ और कुबेरकी आज्ञाके अनुसार मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ अपने प्रभावसे समस्त लोकोंमें विचरण करूँगा’॥ १० ॥
पुष्पकके ऐसा कहनेपर महाबली श्रीरामने उस विमानको पुनः आया देख उससे कहा—॥ ११ ॥