भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2438, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2438

⬅ विषय-सूची (TOC)

चौवालीसवाँ सर्ग

श्रीरामके बुलानेसे सब भाइयोंका उनके पास आना

मित्रमण्डलीको विदा करके श्रीरघुनाथजीने बुद्धिसे विचारकर अपना कर्तव्य निश्चित किया और निकटवर्ती द्वारपालसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘तुम जाकर शीघ्र ही महाभाग भरत, सुमित्राकुमार शुभलक्षण लक्ष्मण तथा अपराजित वीर शत्रुघ्नको भी यहाँ बुला लाओ’॥ २ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर द्वारपालने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और लक्ष्मणके घर जाकर बेरोक-टोक उसके भीतर प्रवेश किया॥ ३ ॥

वहाँ हाथ जोड़ जय-जयकार करते हुए उसने महात्मा लक्ष्मणसे कहा—‘कुमार! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। अतः शीघ्र चलिये, विलम्ब न कीजिये’॥ ४ ॥

तब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीके आदेशको शिरोधार्य किया और तत्काल रथपर बैठकर वे श्रीरघुनाथजीके महलकी ओर तीव्रगतिसे चले॥ ५ ॥

लक्ष्मणको जाते देख द्वारपाल भरतके पास गया और उन्हें हाथ जोड़ वहाँ जय-जयकार करके विनीतभावसे बोला—‘प्रभो! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं’॥ ६½ ॥

श्रीरामके भेजे हुए द्वारपालके मुखसे यह बात सुनकर महाबली भरत तुरंत अपने आसनसे उठ खड़े हुए और पैदल ही चल दिये॥ ७½ ॥

भरतको जाते देख द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ शत्रुघ्नके भवनमें गया और हाथ जोड़कर बोला— ॥ ८½ ॥

‘रघुश्रेष्ठ! आइये, चलिये, राजा श्रीराम आपको देखना चाहते हैं। श्रीलक्ष्मणजी और महायशस्वी भरतजी पहले ही जा चुके हैं’॥ ९½ ॥

द्वारपालकी बात सुनकर शत्रुघ्न अपने उत्तम आसनसे उठे और धरतीपर माथा टेककर मन-ही-मन श्रीरामकी वन्दना करके तुरंत उनके निवासस्थानकी ओर चल दिये॥ १०½ ॥

द्वारपालने आकर श्रीरामसे हाथ जोड़कर निवेदन किया कि ‘प्रभो! आपके सभी भाई द्वारपर उपस्थित हैं’॥ ११½ ॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण · पृष्ठ 2438, कुल 2621 में से · BharatKosha