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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

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कुमारोंका आगमन सुनकर चिन्तासे व्याकुल इन्द्रियवाले श्रीरामने नीचे मुख किये दुःखी मनसे द्वारपालको आदेश दिया— 'तुम तीनों राजकुमारोंको जल्दी मेरे पास ले आओ। मेरा जीवन इन्हींपर अवलम्बित है। ये मेरे प्यारे प्राणस्वरूप हैं'॥ १२-१३½ ॥

महाराजकी आज्ञा पाकर वे श्वेत वस्त्रधारी कुमार सिर झुकाये हाथ जोड़े एकाग्रचित्त हो भवनके भीतर गये॥ १४½ ॥

उन्होंने श्रीरामका मुख इस तरह उदास देखा, मानो चन्द्रमापर ग्रह लग गया हो। वह संध्याकालके सूर्यकी भाँति प्रभाशून्य हो रहा था॥ १५½ ॥

उन्होंने बारम्बार देखा बुद्धिमान् श्रीरामके दोनों नेत्रोंमें आँसू भर आये थे और उनके मुखारविन्दकी शोभा छिन गयी थी॥ १६ ॥

तदनन्तर उन तीनों भाइयोंने तुरंत श्रीरामके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। फिर वे सब-के-सब प्रेममें समाधिस्थ-से होकर पड़ गये। उस समय श्रीराम आँसू बहा रहे थे॥ १७ ॥

महाबली रघुनाथजीने दोनों भुजाओंसे उठाकर उन सबका आलिङ्गन किया और कहा— 'इन आसनोंपर बैठो।' जब वे बैठ गये, तब उन्होंने फिर कहा— ॥ १८ ॥

'राजकुमारो! तुमलोग मेरे सर्वस्व हो। तुम्हीं मेरे जीवन हो और तुम्हारे द्वारा सम्पादित इस राज्यका मैं पालन करता हूँ॥ १९ ॥

'नरेश्वरो! तुम सभी शास्त्रोंके ज्ञाता और उनमें बताये कर्तव्यका पालन करनेवाले हो। तुम्हारी बुद्धि भी परिपक्व है। इस समय मैं जो कार्य तुम्हारे सामने उपस्थित करनेवाला हूँ, उसका तुम सबको मिलकर सम्पादन करना चाहिये'॥ २० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी भाई चौकन्ने हो गये। सबका चित्त उद्विग्न हो गया और सभी सोचने लगे— 'न जाने महाराज हमसे क्या कहेंगे?'॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥