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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पैंतालीसवाँ सर्ग

श्रीरामका भाइयोंके समक्ष सर्वत्र फैले हुए लोकापवादकी चर्चा करके सीताको वनमें छोड़ आनेके लिये लक्ष्मणको आदेश देना

‘सुमित्राकुमार! उस समय अपनी पवित्रताका इस प्रकार सब भाँइ दुःखी मनसे वहाँ बैठे हुए थे। उस समय श्रीरामने सूखे मुखसे उनके सामने यह बात कही—॥ १ ॥

‘बन्धुओ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरी बात सुनो। मनको इधर-उधर न ले जाओ। पुरवासियोंके यहाँ मेरे और सीताके विषयमें जैसी चर्चा चल रही है, उसीको बता रहा हूँ॥ २ ॥

‘इस समय पुरवासियों और जनपदके लोगोंमें सीताके सम्बन्धमें महान् अपवाद फैला हुआ है। मेरे प्रति भी उनका बड़ा घृणापूर्ण भाव है। उन सबकी वह घृणा मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण किये देती है॥ ३ ॥

‘मैं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। सीताने भी महात्मा जनकोंके उत्तम कुलमें जन्म लिया है॥ ४ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! तुम तो यह जानते ही हो कि किस प्रकार रावण निर्जन दण्डकारण्यसे उन्हें हरकर ले गया था और मैंने उसका विध्वंस भी कर डाला॥ ५

‘उसके बाद लङ्कामें ही जानकीके विषयमें मेरे अन्तःकरणमें यह विचार उत्पन्न हुआ था कि इनके इतने दिनोंतक यहाँ रह लेनेपर भी मैं इन्हें राजधानीमें कैसे ले जा सकूँगा॥ ६ ॥

विश्वास दिलानेके लिये सीताने तुम्हारे सामने ही अग्निमें प्रवेश किया था और देवताओंके समक्ष स्वयं अग्निदेवने उन्हें निर्दोष बताया था। आकाशचारी वायु, चन्द्रमा और सूर्यने भी पहले देवताओं तथा समस्त ऋषियोंके समीप जनकनन्दिनीको निष्पाप घोषित किया था॥ ७-८½ ॥

‘इस प्रकार विशुद्ध आचारवाली सीताको देवताओं और गन्धर्वोंके समीप साक्षात् देवराज इन्द्रने लङ्काद्वीपके अंदर मेरे हाथमें सौंपा था॥ ९½ ॥

‘मेरी अन्तरात्मा भी यशस्विनी सीताको शुद्ध समझती है। इसीलिये मैं इन विदेहनन्दिनीको साथ लेकर अयोध्या आया था॥ १०½ ॥