श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2441, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘परंतु अब यह महान् अपवाद फैलने लगा है। पुरवासियों और जनपदके लोगोंमें मेरी बड़ी निन्दा हो रही है। इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा शोक है॥ ११½ ॥
‘जिस किसी भी प्राणीकी अपकीर्ति लोकमें सबकी चर्चाका विषय बन जाती है, वह अधम लोकों (नरकों)-में गिर जाता है और जबतक उस अपयशकी चर्चा होती है तबतक वहीं पड़ा रहता है॥ १२½ ॥
‘देवगण लोकोंमें अपकीर्तिकी निन्दा और कीर्तिकी प्रशंसा करते हैं। समस्त श्रेष्ठ महात्माओंका सारा शुभ आयोजन उत्तम कीर्तिकी स्थापनाके लिये ही होता है॥ १३½ ॥
‘नरश्रेष्ठ बन्धुओ! मैं लोकनिन्दाके भयसे अपने प्राणोंको और तुम सबको भी त्याग सकता हूँ। फिर सीताको त्यागना कौन बड़ी बात है?॥ १४½ ॥
‘अतः तुमलोग मेरी ओर देखो। मैं शोकके समुद्रमें गिर गया हूँ। इससे बढ़कर कभी कोर्इ दुःख मुझे उठाना पड़ा हो, इसकी मुझे याद नहीं है॥ १५½ ॥
‘अतः सुमित्राकुमार! कल सबेरे तुम सारथि सुमन्त्रके द्वारा संचालित रथपर आरूढ़ हो सीताको भी उसीपर चढ़ाकर इस राज्यकी सीमाके बाहर छोड़ दो॥ १६½ ॥
‘गङ्गाके उस पार तमसाके तटपर महात्मा वाल्मीकिमुनिका दिव्य आश्रम है॥ १७½ ॥
‘रघुनन्दन! उस आश्रमके निकट निर्जन वनमें तुम सीताको छोड़कर शीघ्र लौट आओ। सुमित्रानन्दन! मेरी इस आज्ञाका पालन करो। सीताके विषयमें मुझसे किसी तरह कोर्इ दूसरी बात तुम्हें नहीं कहनी चाहिये॥ १८-१९ ॥
‘इसलिये लक्ष्मण! अब तुम जाओ। इस विषयमें कोर्इ सोच-विचार न करो। यदि मेरे इस निश्चयमें तुमने किसी प्रकारकी अड़चन डाली तो मुझे महान् कष्ट होगा॥ २० ॥
‘मैं तुम्हें अपने चरणों और जीवनकी शपथ दिलाता हूँ, मेरे निर्णयके विरुद्ध कुछ न कहो। जो मेरे इस कथनके बीचमें कूदकर किसी प्रकार मुझसे अनुनय-विनय करनेके लिये कुछ कहेंगे, वे मेरे अभीष्ट कार्यमें बाधा डालनेके कारण सदाके लिये मेरे शत्रु होंगे॥ २१½ ॥
‘यदि तुमलोग मेरा सम्मान करते हो और मेरी आज्ञामें रहना चाहते हो तो अब सीताको यहाँसे वनमें ले जाओ। मेरी इस आज्ञाका पालन करो॥ २२½ ॥
‘सीताने पहले मुझसे कहा था कि मैं गङ्गातटपर ऋषियोंके आश्रम देखना चाहती हूँ; अतः उनकी यह इच्छा भी पूर्ण की जाय’॥ २३½ ॥