श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मणको शोकसे आतुर देख धर्मज्ञा सीता अत्यन्त चिन्तित हो उनसे बोलीं— ‘लक्ष्मण! यह क्या? तुम रोते क्यों हो! गङ्गाके तटपर आकर तो मेरी चिरकालकी अभिलाषा पूर्ण हुई है। इस हर्षके समय तुम रोकर मुझे दुःखी क्यों करते हो?॥ २५-२६ ॥
‘पुरुषप्रवर! श्रीरामके पास तो तुम सदा ही रहते हो। क्या दो दिनतक उनसे बिछुड़ जानेके कारण तुम इतने शोकाकुल हो गये हो?॥ २७ ॥
‘लक्ष्मण! श्रीराम तो मुझे भी अपने प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हैं; परंतु मैं तो इस प्रकार शोक नहीं कर रही हूँ। तुम ऐसे नादान न बनो॥ २८ ॥
‘मुझे गङ्गाके उस पार ले चलो और तपस्वी मुनियोंके दर्शन कराओ। मैं उन्हें वस्त्र और आभूषण दूँगी॥ २९ ॥
‘तत्पश्चात् उन महर्षियोंका यथायोग्य अभिवादन करके वहाँ एक रात ठहरकर हम पुनः अयोध्यापुरीको लौट चलेंगे॥ ३० ॥
‘मेरा मन भी सिंहके समान वक्षःस्थल, कृश उदर और कमलके समान नेत्रवाले श्रीरामको, जो मनको रमानेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, देखनेके लिये उतावला हो रहा है’॥ ३१ ॥
सीताजीका यह वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपनी दोनों सुन्दर आँखें पोंछ लीं और नाविकोंको बुलाया। उन मल्लाहोंने हाथ जोड़कर कहा— ‘प्रभो! यह नाव तैयार है’॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥