श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘लक्ष्मण! तुम अन्तःपुरकी सभी वन्दनीया स्त्रियोंको मेरी ओरसे प्रणाम करके मेरा समाचार उन्हें सुना देना तथा जो सदा धर्म-पालनके लिये सावधान रहते हैं, उन महाराजको भी मेरा यह संदेश सुना देना॥ ११ ॥
तदनन्तर भागीरथीके उस तटपर पहुँचकर लक्ष्मणके नेत्रोंमें आँसू भर आये और उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीतासे हाथ जोड़कर कहा— ॥ ३ ॥
‘विदेहनन्दिनि! मेरे हृदयमें सबसे बड़ा काँटा यही खटक रहा है कि आज रघुनाथजीने बुद्धिमान् होकर भी मुझे वह काम सौंपा है, जिसके कारण लोकमें मेरी बड़ी निन्दा होगी॥ ४ ॥
‘इस दशामें यदि मुझे मृत्युके समान यन्त्रणा प्राप्त होती अथवा मेरी साक्षात् मृत्यु ही हो जाती तो वह मेरे लिये परम कल्याणकारक होती। परंतु इस लोकनिन्दित कार्यमें मुझे लगाना उचित नहीं था॥ ५ ॥
‘शोभने! आप प्रसन्न हों। मुझे कोऽइ दोष न दें’ ऐसा कहकर हाथ जोड़े हुए लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ६ ॥
लक्ष्मण हाथ जोड़कर रो रहे हैं और अपनी मृत्यु चाह रहे हैं, यह देखकर मिथिलेशकुमारी सीता अत्यन्त उद्विग्न हो उठीं और लक्ष्मणसे बोलीं— ॥ ७ ॥
‘लक्ष्मण! यह क्या बात है? मैं कुछ समझ नहीं पाती हूँ। ठीक-ठीक बताओ। महाराज कुशलसे तो हैं न। मैं देखती हूँ तुम्हारा मन स्वस्थ नहीं है॥ ८ ॥
‘मैं महाराजकी शपथ दिलाकर पूछती हूँ, जिस बातसे तुम्हें इतना संताप हो रहा है, वह मेरे निकट सच-सच बताओ। मैं इसके लिये तुम्हें आज्ञा देती हूँ’॥ ९ ॥
विदेहनन्दिनीके इस प्रकार प्रेरित करनेपर लक्ष्मण दुःखी मनसे नीचे मुँह किये अश्रुगद्गद कण्ठद्वारा इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥
‘जनकनन्दिनि! नगर और जनपदमें आपके विषयमें जो अत्यन्त भयंकर अपवाद फैला हुआ है, उसे राजसभामें सुनकर श्रीरघुनाथजीका हृदय संतप्त हो उठा और वे मुझसे सब बातें बताकर महलमें चले गये॥ ११½ ॥
‘देवि! राजा श्रीरामने जिन अपवादवचनोंको दुःख न सह सकनेके कारण अपने हृदयमें रख लिया है, उन्हें मैं आपके सामने बता नहीं सकता। इसीलिये मैंने उनकी चर्चा छोड़ दी है॥ १२½ ॥