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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2471

‘अपने इस पापके कारण मेरे क्रोधसे कलुषित हो तू कुछ कालतक मनुष्यलोकमें जाकर निवास करेगी॥ २४ ॥

‘दुर्बुद्धे! बुधके पुत्र राजर्षि पुरूरवा, जो काशिदेशके राजा हैं, उनके पास चली जा, वे ही तेरे पति होंगे’॥

‘तब वह शाप-दोषसे दूषित हो प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग-झूसी)-में बुधके औरस पुत्र पुरूरवाके पास गयी॥ २६ ॥

‘पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे श्रीमान् आयु नामक महाबली पुत्र हुआ, जिसके पुत्र इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज नहुष थे॥ २७ ॥

‘वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार करके जब देवराज इन्द्र ब्रह्महत्याके भयसे दुःखी हो छिप गये थे, तब नहुषने ही एक लाख वर्षोंतक ‘इन्द्र’ पदपर प्रतिष्ठित हो त्रिलोकीके राज्यका शासन किया था॥ २८ ॥

‘मनोहर दाँत और सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी मित्रके दिये हुए उस शापसे भूतलपर चली गयी। वहाँ वह सुन्दरी बहुत वर्षोंतक रही। फिर शापका क्षय होनेपर इन्द्रसभामें चली गयी’॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥