श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2480, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रक्षिप्त सर्ग १*
श्रीरामके द्वारपर कार्यार्थी कुत्तेका आगमन और श्रीरामका उसे दरबारमें लानेका आदेश
तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें पूर्वाह्नकालोचित संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके कमलनयन राजा श्रीराम राजधर्मोंका पालन (प्रजाजनोंके विवादका निपटारा) करनेके लिये वेदवेत्ता ब्राह्मणों, पुरोहित वसिष्ठ तथा कश्यप मुनिके साथ राजसभामें उपस्थित हो धर्म (न्याय)-के आसनपर विराजमान हुए॥ १-२ ॥
वह सभा व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रियों, धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले विद्वानों, नीतिज्ञों, राजाओं तथा अन्य सभासदोंसे भरी हुई थी॥ ३ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले राजसिंह श्रीरामकी वह सभा इन्द्र, यम और वरुणकी सभाके समान शोभा पाती थी॥ ४ ॥
वहाँ बैठे हुए भगवान् श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे कहा— 'माता सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर! तुम बाहर निकलो और देखो कि कौन-कौन-से कार्यार्थी उपस्थित हैं। सुमित्राकुमार! तुम उन कार्यार्थियोंको बारी-बारीसे बुलाना आरम्भ करो'॥ ५ १/२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर शुभलक्षण लक्ष्मणने द्वारदेशपर आकर स्वयं ही कार्यार्थियोंको पुकारा, परंतु कोई भी वहाँ यह न कह सका कि मुझे यहाँ कोई कार्य है॥ ६-७ ॥
श्रीरामके राज्य-शासन करते समय न तो कहीं किसीको शारीरिक रोग होते थे और न मानसिक चिन्ताएँ ही सताती थीं। पृथ्वीपर सब प्रकारकी ओषधियाँ (अन्न-फल आदि) उत्पन्न होती थीं और पकी हुई खेती शोभा पाती थी॥ ८ ॥
श्रीरामके राज्यमें न तो बालककी मृत्यु होती थी न युवककी और न मध्यम अवस्थाके पुरुषकी ही। सबका धर्मपूर्वक शासन होता था। किसीके सामने कभी कोई बाधा नहीं आती थी॥ ९ ॥
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी कोई कार्यार्थी (अभियोग लेकर आनेवाला पुरुष) दिखायी नहीं देता था। लक्ष्मणने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको राज्यकी ऐसी स्थिति बतायी॥