श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2481, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें१० ॥
तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए श्रीरामने सुमित्राकुमारसे पुनः इस प्रकार कहा— ‘लक्ष्मण! तुम फिर जाओ और कार्यार्थी पुरुषोंका पता लगाओ॥ ११ ॥
‘भलीभाँति उत्तम नीतिका प्रयोग करनेसे राज्यमें कहीं अधर्म नहीं रह जाता है। अतः सभी लोग राजाके भयसे यहाँ एक-दूसरेकी रक्षा करते हैं॥ १२ ॥
‘यद्यपि राजकर्मचारी मेरे छोड़े हुए बाणोंके समान यहाँ प्रजाकी रक्षा करते हैं, तथापि महाबाहो! तुम स्वयं भी तत्पर रहकर प्रजाका पालन किया करो’॥ १३ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मण राजभवनसे बाहर निकले। बाहर आकर उन्होंने देखा, द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो उन्हींकी ओर देखता हुआ बारंबार भूँक रहा है। उसे इस प्रकार देखकर पराक्रमी लक्ष्मणने उससे पूछा— ॥ १४-१५ ॥
‘महाभाग! तुम निर्भय होकर बताओ, तुम्हारा क्या काम है?’ लक्ष्मणका यह वचन सुनकर कुत्तेने कहा— ॥ १६ ॥
‘जो समस्त भूतोंको शरण देनेवाले और क्लेशरहित कर्म करनेवाले हैं, जो भयके अवसरोंपर भी अभय देते हैं, उन भगवान् श्रीरामके समक्ष ही मैं अपना काम बता सकता हूँ’॥ १७ ॥
कुत्तेका यह कथन सुनकर लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीको इसकी सूचना देनेके लिये सुन्दर राजभवनमें प्रवेश किया॥
श्रीरामको उसकी बात बताकर लक्ष्मण पुनः राजभवनसे बाहर निकल आये और उससे बोले— ‘यदि तुम्हें कुछ कहना है तो चलकर राजासे ही कहो’॥ १९ ॥
लक्ष्मणकी वह बात सुनकर कुत्ता बोला— ‘सुमित्रानन्दन! देवालयमें, राजभवनमें तथा ब्राह्मणके घरोंमें अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वायुदेवता सदा स्थित रहते हैं; अतः हम अधमयोनिके जीव स्वेच्छासे वहाँ जानेके योग्य नहीं हैं॥ २०-२१ ॥
‘मैं इस राजभवनमें प्रवेश नहीं कर सकूँगा; क्योंकि राजा श्रीराम धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। वे सत्यवादी, संग्रामकुशल और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं॥ २२ ॥
‘वे संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंके प्रयोगके अवसरोंको जानते हैं। श्रीरघुनाथजी न्याय करनेवाले हैं। वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हैं। श्रीराम दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं॥ २३