भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2486

तदनन्तर वे सब मुनि उस समय श्रीरामसे ही बोले— ‘रघुनन्दन! राजा सबका शासक होता है। विशेषतः आप तो तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले साक्षात् सनातन देवता भगवान् विष्णु हैं’॥ ३५-३६ ॥

उन सबके ऐसा कहनेपर कुत्ता बोला— ‘श्रीराम! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं, यदि आपको मुझे इच्छानुसार वर देना है, तो मेरी बात सुनिये॥ ३७ ॥

‘वीर नरेश्वर! आपने प्रतिज्ञापूर्वक पूछा है कि मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ। इस प्रकार आप मेरी इच्छा पूर्ण करनेको प्रतिज्ञाबद्ध हो चुके हैं। अतः मैं कहता हूँ कि इस ब्राह्मणको कुलपति (महन्त) बना दीजिये। महाराज! इसे कालञ्जरमें एक मठका आधिपत्य (वहाँकी महन्थी) प्रदान कर दीजिये’॥ ३८ १/२ ॥

यह सुनकर श्रीरामने उसका कुलपतिके पदपर अभिषेक कर दिया। इस प्रकार पूजित हुआ वह ब्राह्मण हाथीकी पीठपर बैठकर बड़े हर्षके साथ वहाँसे चला गया॥ ३९ १/२ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीके मन्त्री मुसकराते हुए बोले— ‘महातेजस्वी महाराज! यह तो इसे वर दिया गया है, शाप या दण्ड नहीं’॥ ४० १/२ ॥

‘मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर श्रीरामने कहा— ‘किस कर्मका क्या परिणाम होता है अथवा उससे जीवकी कैसी गति होती है, इसका तत्त्व तुमलोग नहीं जानते। ब्राह्मणको मठाधीशका पद क्यों दिया गया? इसका कारण यह कुत्ता जानता है’॥ ४१ १/२ ॥

तत्पश्चात् श्रीरामके पूछनेपर कुत्तेने इस प्रकार कहा— ‘रघुनन्दन! मैं पहले जन्ममें कालञ्जरके मठमें कुलपति (मठाधीश) था। वहाँ यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहता, दास-दासियोंको उनका न्यायोचित भाग बाँट देता, शुभ कर्मोंमें अनुरक्त रहता, देवसम्पत्तिकी रक्षा करता तथा विनय और शीलसे सम्पन्न होकर समस्त प्राणियोंके हित-साधनमें संलग्न रहता था॥ ४२—४४ ॥

‘तो भी मुझे यह घोर अवस्था एवं अधम गति प्राप्त हुई है। फिर जो ऐसा क्रोधी है, धर्मको छोड़ चुका है, दूसरोंके अहितमें लगा हुआ है तथा क्रोध करनेवाला, क्रूर, कठोर, मूर्ख और अधर्मी है, वह ब्राह्मण तो मठाधीश होकर अपने साथ ही ऊपर और नीचेकी सात-सात पीढ़ियोंको भी नरकमें गिराकर ही रहेगा॥ ४५-४६ ॥