भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2487

‘इसलिये किसी भी दशामें मठाधीशका पद नहीं ग्रहण करना चाहिये। जिसे पुत्र, पशु और बन्धु-बान्धवोंसहित नरकमें गिरा देनेकी इच्छा हो, उसे देवताओं, गौओं और ब्राह्मणोंका अधिष्ठाता बना दे॥

‘जो ब्राह्मणका, देवताका, स्त्रियोंका और बालकोंका धन हर लेता है तथा जो अपनी दान की हुई सम्पत्तिको फिर वापस ले लेता है, वह इष्टजनोंसहित नष्ट हो जाता है॥ ४८ १/२ ॥

‘रघुनन्दन! जो ब्राह्मणों और देवताओंका द्रव्य हड़प लेता है, वह शीघ्र ही अवीचि नामक घोर नरकमें गिर जाता है॥ ४९ १/२ ॥

‘जो देवता और ब्राह्मणकी सम्पत्तिको हर लेनेका विचार भी मनमें लाता है, वह नराधम निश्चय ही एक नरकसे दूसरे नरकमें गिरता रहता है’॥ ५० १/२ ॥

कुत्तेका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और वह महातेजस्वी कुत्ता भी जिधरसे आया था, उधर ही चला गया॥ ५१ १/२ ॥

वह पूर्वजन्ममें बड़ा मनस्वी था, परंतु इस जन्ममें वह कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न होनेके कारण दूषित हो गया था। उस महाभाग कुत्तेने काशीमें जाकर प्रायोपवेशन कर लिया (अन्न-जल छोड़कर अपने प्राण त्याग दिये)॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ॥
२॥


* जो ऊपरसे मित्र जान पड़े किंतु परिणाममें शत्रु सिद्ध हो, वह ‘मित्रमुख’ शत्रु है। क्रोध अपने प्रतिद्वन्द्वीको सतानेमें सहायक-सा बनकर आता है, इसीलिये इसे मित्रमुख कहा गया है। ११२७