श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआसनोंपर बैठे॥ ११ १/२ ॥
उन महर्षियोंको वहाँ आसनोंपर विराजमान देख शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ संयतभावसे कहा— ॥ १२ ॥
‘महर्षियो! किस कामसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है! मैं एकाग्रचित्त होकर आपकी क्या सेवा करूँ? यह सेवक आपकी आज्ञा पानेके योग्य है। आदेश मिलनेपर मैं बड़े सुखसे आपकी सभी इच्छाओंको पूर्ण कर सकता हूँ॥ १३ ॥
‘यह सारा राज्य, इस हृदयकमलमें विराजमान यह जीवात्मा तथा यह मेरा सारा वैभव ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये ही है, मैं आपके समक्ष यह सच्ची बात कहता हूँ’॥ १४ ॥
श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर उन यमुनातीरनिवास ◌ी उग्र तपस्वी महर्षियोंने उच्च स्वरसे उन्हें साधुवाद दिया॥ १५ ॥
फिर वे महात्मा बड़े हर्षके साथ बोले— ‘नरश्रेष्ठ! इस भूमण्डलमें ऐसी बातें आपके ही योग्य हैं। दूसरे किसीके मुखसे इस तरहकी बात नहीं निकलती॥ १६ ॥
‘राजन्! हम बहुत-से महाबली राजाओंके पास गये; परंतु उन्होंने कार्यके गौरवको समझकर उसे सुननेके बाद भी ‘करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करनेकी रुचि नहीं दिखायी॥ १७ ॥
‘परंतु आपने हमारे आनेका कारण जाने बिना ही केवल ब्राह्मणोंके प्रति आदरका भाव होनेसे हमारा काम करनेकी प्रतिज्ञा कर डाली है; इसलिये आप अवश्य यह काम कर सकेंगे, इसमें संशय नहीं है। आप ही महान् भयसे ऋषियोंको बचा सकेंगे’॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
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