श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2493, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंबासठवाँ सर्ग
श्रीरामका ऋषियोंसे लवणासुरके आहार-विहारके विषयमें पूछना और शत्रुघ्नकी रुचि जानकर उन्हें लवण-वधके कार्यमें नियुक्त करना
ऋषियोंके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे हाथ जोड़कर पूछा—‘लवणासुर क्या खाता है? उसका आचार-व्यवहार कैसा है—रहने-सहनेका ढंग क्या है? और वह कहाँ रहता है?’॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर उन सभी ऋषियोंने जिस तरहके आहार-व्यवहारसे लवणासुर पला था, वह सब कह सुनाया॥ २ ॥
वे बोले— ‘प्रभो! उसका आहार तो सभी प्राणी हैं; परंतु विशेषतः वह तपस्वी मुनियोंको खाता है। उसके आचार-व्यवहारमें बड़ी क्रूरता और भयानकता है और वह सदा मधुवनमें निवास करता है॥ ३ ॥
‘वह प्रतिदिन कँइ सहस्र सिंह, व्याघ्र, मृग, पक्षी और मनुष्योंको मारकर खा जाता है॥ ४ ॥
‘संहारकाल आनेपर मुँह बाकर खड़े हुए यमराजके समान वह महाबली असुर दूसरे-दूसरे जीवोंको भी खाता रहता है’॥ ५ ॥
उनका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने उन महामुनियोंसे कहा—‘महर्षियो! मैं उस राक्षसको मरवा डालूँगा। आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये’॥ ६ ॥
इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी मुनियोंके समक्ष प्रतिज्ञा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने वहाँ एकत्र हुए अपने सब भाइयोंसे पूछा—॥ ७ ॥
‘बन्धुओ! लवणको कौन वीर मारेगा? उसे किसके हिस्सेमें रखा जाय—महाबाहु भरतके या बुद्धिमान् शत्रुघ्नके’॥
रघुनाथजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतजी बोले— ‘भैया! मैं इस लवणका वध करूँगा। इसे मेरे हिस्सेमें रखा जाय’॥ ९ ॥
भरतजीके ये धीरता और वीरतापूर्ण शब्द सुनकर शत्रुघ्नजी सोनेका सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और महाराज श्रीरामको प्रणाम करके बोले—‘रघुनन्दन! महाबाहु मझले भैया तो बहुत-