श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2510, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘मैं युद्ध करना चाहता हूँ। इसलिये तू मुझे द्वन्द्वयुद्धका अवसर दे। तू सम्पूर्ण प्राणियोंका शत्रु है; इसलिये अब मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकेगा’॥ १२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उन नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नसे हँसता हुआ-सा बोला—‘दुर्मते! सौभाग्यकी बात है कि आज तू स्वयं ही मुझे मिल गया॥ १३ ॥
‘खोटी बुद्धिवाले नराधम! रावण नामक राक्षस मेरी मौसी शूर्पणखाका भाँइ था, जिसे तेरे भाँइ रामने एक स्त्रीके लिये मार डाला॥ १४ ॥
‘इतना ही नहीं, उन्होंने रावणके कुलका संहार कर दिया, तथापि मैंने वह सब कुछ सह लिया। तुमलोगोंके द्वारा की गयी अवहेलनाको सामने रखकर— प्रत्यक्ष देखकर भी तुम सबके प्रति मैंने विशेषरूपसे क्षमाभावका परिचय दिया॥ १५ ॥
‘जो नराधम भूतकालमें मेरा सामना करनेके लिये आये थे, उन सबको मैंने तिनकोंके समान तुच्छ समझकर तिरस्कृत किया और मार डाला। जो भविष्यमें आयेंगे, उनकी भी यही दशा होगी और वर्तमानकालमें आनेवाले तुझ-जैसे नराधम भी मेरे हाथसे मरे हुए ही हैं॥ १६ ॥
‘दुर्मते! तुझे युद्धकी इच्छा है न? मैं अभी तुझे युद्धका अवसर दूँगा। तू दो घड़ी ठहर जा। तबतक मैं भी अपना अस्त्र ले आता हूँ॥ १७ ॥
‘तेरे वधके लिये जैसे अस्त्रका होना मुझे अभीष्ट है, वैसे अस्त्रको पहले सुसज्जित कर लूँ; फिर युद्धका अवसर दूँगा।’ यह सुनकर शत्रुघ्न तुरंत बोल उठे— ‘अब तू मेरे हाथसे जीवित बचकर कहाँ जायगा?॥ १८ ॥
‘किसी भी बुद्धिमान् पुरुषको अपने सामने आये हुए शत्रुको छोड़ना नहीं चाहिये। जो अपनी घबरायी हुँइ बुद्धिके कारण शत्रुको निकल जानेका अवसर दे देता है, वह मन्दबुद्धि पुरुष कायरके समान मारा जाता है॥ १९ ॥
‘अतः राक्षस! अब तू इस जीव-जगत्को अच्छी तरह देख ले। मैं नाना प्रकारके तीखे बाणोंद्वारा तुझ पापीको अभी यमराजके घरकी ओर भेजता हूँ; क्योंकि तू तीनों लोकोंका तथा श्रीरघुनाथजीका भी शत्रु है’॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥