भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2512

तब बल-विक्रमशाली लवणने हँसकर एक वृक्ष उठाया और उसे शूरवीर शत्रुघ्नके सिरपर दे मारा। उसकी चोट खाकर शत्रुघ्नके सारे अङ्ग शिथिल हो गये और उन्हें मूर्च्छा आ गयी॥ १२ ॥

वीर शत्रुघ्नके गिरते ही ऋषियों, देवसमूहों, गन्धर्वों और अप्सराओंमें महान् हाहाकार मच गया॥ १३ ॥

शत्रुघ्नजीको भूमिपर गिरा देख लवणने समझा ये मर गये, इसलिये अवसर मिलनेपर भी वह राक्षस अपने घरमें नहीं गया और न शूल ही ले आया। उन्हें धराशायी हुआ देख सर्वथा मरा हुआ समझकर ही वह अपनी उस भोजनसामग्रीको एकत्र करने लगा॥ १४-१५ ॥

दो ही घड़ीमें शत्रुघ्नको होश आ गया। वे अस्त्र-शस्त्र लेकर उठे और फिर नगरद्वारपर खड़े हो गये। उस समय ऋषियोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ १६ ॥

तदनन्तर शत्रुघ्नने उस दिव्य, अमोघ और उत्तम बाणको हाथमें लिया, जो अपने घोर तेजसे प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें व्याप्त-सा हो रहा था॥ १७ ॥

उसका मुख और वेग वज्रके समान था। वह मेरु और मन्दराचलके समान भारी था। उसकी गाँठें झुकी हुईं थीं तथा वह किसी भी युद्धमें पराजित होनेवाला नहीं था॥ १८ ॥

उसका सारा अङ्ग रक्तरूपी चन्दनसे चर्चित था। पंख बड़े सुन्दर थे। वह बाण दानवराजरूपी पर्वतराजों एवं असुरोंके लिये बड़ा भयंकर था॥ १९ ॥

वह प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रज्वलित हुई कालाग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था। उसे देखकर समस्त प्राणी त्रस्त हो गये॥ २० ॥

देवता, असुर, गन्धर्व, मुनि और अप्सराओंके साथ सारा जगत् अस्वस्थ हो ब्रह्माजीके पास पहुँचा॥ २१ ॥

जगत्के उन सभी प्राणियोंने वर देनेवाले देवदेवेश्वर प्रपितामह ब्रह्माजीसे कहा— 'भगवन्! समस्त लोकोंके संहारकी सम्भावनासे देवताओंपर भी भय और मोह छा गया है॥ २२ ॥

‘देव! कहीं लोकोंका संहार तो नहीं होगा अथवा प्रलयकाल तो नहीं आ पहुँचा है? प्रपितामह! संसारकी ऐसी अवस्था न तो पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी’॥ २३ ॥