भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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इकहत्तरवाँ सर्ग

शत्रुघ्नका थोड़े-से सैनिकोंके साथ अयोध्याको प्रस्थान, मार्गमें वाल्मीकिके आश्रममें रामचरितका गान सुनकर उन सबका आश्चर्यचकित होना

तदनन्तर बारहवें वर्षमें थोड़े-से सेवकों और सैनिकोंको साथ ले शत्रुघ्नने श्रीरामपालित अयोध्याको जानेका विचार किया॥ १ ॥

अतः अपने मुख्य-मुख्य मन्त्रियों तथा सेनापतियोंको लौटाकर—पुरीकी रक्षाके लिये वहीं छोड़कर वे अच्छे-अच्छे घोड़ेवाले सौ रथ साथ ले अयोध्याकी ओर चल पड़े॥ २ ॥

महायशस्वी रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न यात्रा करनेके पश्चात् मार्गमें सात-आठ परिगणित स्थानोंपर पड़ाव डालते हुए वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर जा पहुँचे और रातमें वहीं ठहरे॥ ३ ॥

उन पुरुषप्रवर रघुवीरने वाल्मीकिजीके चरणोंमें प्रणाम करके उनके हाथसे पाद्य और अर्घ्य आदि आतिथ्य-सत्कारकी सामग्री ग्रहण की॥ ४ ॥

वहाँ महर्षि वाल्मीकिने महात्मा शत्रुघ्नको सुनानेके लिये भाँति-भाँतिकी सहस्रों सुमधुर कथाएँ कहीं॥ ५ ॥

फिर वे लवणवधके विषयमें बोले—'लवणासुरको मारकर तुमने अत्यन्त दुष्कर कर्म किया है॥ ६ ॥

'सौम्य! महाबाहो! लवणासुरके साथ युद्ध करके बहुत-से महाबली भूपाल सेना और सवारियोंसहित मारे गये हैं॥ ७ ॥

'पुरुषश्रेष्ठ! वही पापी लवणासुर तुम्हारे द्वारा अनायास ही मार डाला गया। उसके कारण जगत्में जो भय छा गया था, वह तुम्हारे तेजसे शान्त हो गया॥ ८ ॥

'रावणका घोर वध महान् प्रयत्नसे किया गया था; परंतु यह महान् कर्म तुमने बिना यत्नके ही सिद्ध कर दिया॥ ९ ॥

'लवणासुरके मारे जानेसे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई है। तुमने समस्त प्राणियों और सारे जगत्का प्रिय कार्य किया है॥ १० ॥

'नरश्रेष्ठ! मैं इन्द्रकी सभामें बैठा था। जब वह विमानाकार सभा युद्ध देखनेके लिये आयी, तब वहीं बैठे-बैठे मैंने भी तुम्हारे और लवणके युद्धको भलीभाँति देखा था॥ ११ ॥