श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘शत्रुघ्न! मेरे हृदयमें भी तुम्हारे लिये बड़ा प्रेम है। अतः मैं तुम्हारा मस्तक सँघूँगा। यही स्नेहकी पराकाष्ठा है’॥ १२ ॥
ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् वाल्मीकिने शत्रुघ्नका मस्तक सँघा और उनका तथा उनके साथियोंका आतिथ्य सत्कार किया॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नने भोजन किया और उस समय श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रका क्रमशः वर्णन सुना, जो गीतकी मधुरताके कारण बड़ा ही प्रिय एवं उत्तम जान पड़ता था॥ १४ ॥
उस वेलामें उन्हें जो रामचरित सुननेको मिला, वह पहले ही काव्यबद्ध कर लिया गया था। वह काव्यगान वीणाकी लयके साथ हो रहा था। हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीन स्थानोंमें मन्द्र, मध्यम और तार स्वरके भेदसे उच्चारित हो रहा था। संस्कृत भाषामें निर्मित होकर व्याकरण, छन्द, काव्य और संगीत-शास्त्रके लक्षणोंसे सम्पन्न था और गानोचित तालके साथ गाया गया था॥ १५ १/२ ॥
उस काव्यके सभी अक्षर एवं वाक्य सच्ची घटनाका प्रतिपादन करते थे और पहले जो वृत्तान्त घटित हो चुके थे, उनका यथार्थ परिचय दे रहे थे। वह अद्भुत काव्यगान सुनकर पुरुषसिंह शत्रुघ्न मूर्च्छित-से हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी॥ १६ १/२ ॥
वे दो घड़ीतक अचेत-से होकर बारम्बार लम्बी साँस खींचते रहे। उस गानमें उन्होंने बीती हुई बातोंको वर्तमानकी भाँति सुना॥ १७ १/२ ॥
राजा शत्रुघ्नके जो साथी थे, वे भी उस गीत-सम्पत्तिको सुनकर दीन और नतमस्तक हो बोले—‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’॥ १८ १/२ ॥
शत्रुघ्नके जो सैनिक वहाँ मौजूद थे, वे परस्पर कहने लगे—‘यह क्या बात है? हमलोग कहाँ हैं? यह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं। जिन बातोंको हम पहले देख चुके हैं, उन्हींको इस आश्रमपर ज्यों-की-त्यों सुन रहे हैं॥ १९-२० ॥
‘क्या इस उत्तम गीतबन्धको हमलोग स्वप्नमें सुन रहे हैं?’ फिर अत्यन्त विस्मयमें पड़कर वे शत्रुघ्नसे बोले—॥ २१ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आप इस विषयमें मुनिवर वाल्मीकिजीसे भलीभाँति पूछें।’ शत्रुघ्नने कौतूहलमें भरे हुए उन सब सैनिकोंसे कहा—‘मुनिके इस आश्रममें ऐसी अनेक आश्चर्यजनक घटनाएँ होती रहती हैं। उनके विषयमें उनसे कुछ पूछताछ करना हमारे लिये उचित नहीं है॥ २२-२३ ॥