भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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‘रघुनन्दन! आपका दर्शन किये बिना ये बारह वर्ष तो किसी प्रकार बीत गये; किंतु नरेश्वर! अब और अधिक कालतक आपसे दूर रहनेका मुझमें साहस नहीं है॥ ११ ॥

‘अमित पराक्रमी काकुत्स्थ! जैसे छोटा बच्चा अपनी माँसे अलग नहीं रह सकता, उसी प्रकार मैं चिरकालतक आपसे दूर नहीं रह सकूँगा। इसलिये आप मुझपर कृपा करें'॥ १२ ॥

ऐसी बातें कहते हुए शत्रुघ्नको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘शूरवीर! विषाद न करो। इस तरह कातर होना क्षत्रियोचित चेष्टा नहीं है॥ १३ ॥

‘रघुकुलभूषण! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुःखी नहीं होते हैं। रघुवीर! राजाको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये॥ १४ ॥

‘नरश्रेष्ठ वीर! समय-समयपर मुझसे मिलनेके लिये अयोध्या आया करो और फिर अपनी पुरीको लौट जाया करो॥ १५ ॥

‘निःसंदेह तुम मुझे भी प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हो। परंतु राज्यका पालन करना भी तो आवश्यक कर्तव्य है॥ १६ ॥

‘अतः काकुत्स्थ! अभी सात दिन तो तुम मेरे साथ रहो। उसके बाद सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मधुरापुरीको चले जाना’॥ १७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात धर्मयुक्त होनेके साथ ही मनके अनुकूल थी। इसे सुनकर शत्रुघ्नने श्रीरामवियोगके भयसे दीन वाणीद्वारा कहा—‘जैसी प्रभुकी आज्ञा’॥ १८ ॥

श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे सात दिन अयोध्यामें ठहरकर महाधनुर्धर ककुत्स्थकुलभूषण शत्रुघ्न वहाँसे जानेको तैयार हो गये॥ १९ ॥

सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम, भरत और लक्ष्मणसे विदा ले शत्रुघ्न एक विशाल रथपर आरूढ़ हुए॥ २० ॥

महात्मा लक्ष्मण और भरत पैदल ही उन्हें पहुँचानेके लिये बहुत दूरतक पीछे-पीछे गये। तत्पश्चात् शत्रुघ्न रथके द्वारा शीघ्र ही अपनी राजधानीकी ओर चल दिये॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२॥