भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तिहत्तरवाँ सर्ग

एक ब्राह्मणका अपने मरे हुए बालकको राजद्वारपर लाना तथा राजाको ही दोषी बताकर विलाप करना

शत्रुघ्नको मथुरा भेजकर भगवान् श्रीराम भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंके साथ धर्मपूर्वक राज्यका पालन करते हुए बड़े सुख और आनन्दसे रहने लगे॥ १ ॥

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद उस जनपदके भीतर रहनेवाला एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुए बालकका शव लेकर राजद्वारपर आया॥ २ ॥

वह स्नेह और दुःखसे आकुल हो नाना प्रकारकी बातें कहता हुआ रो रहा था और बार-बार ‘बेटा! बेटा!’ की पुकार मचाता हुआ इस प्रकार विलाप करता था— ॥

‘हाय! मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके कारण आज इन आँखोंसे मैं अपने इकलौते बेटेकी मृत्यु देख रहा हूँ॥ ४ ॥

‘बेटा! अभी तो तू बालक था। जवान भी नहीं होने पाया था। केवल पाँच हजार दिन* (तेरह वर्ष दस महीने बीस दिन)-की तेरी अवस्था थी। तो भी तू मुझे दुःख देनेके लिये असमयमें ही कालके गालमें चला गया॥ ५ ॥

‘वत्स! तेरे शोकसे मैं और तेरी माता—दोनों थोड़े ही दिनोंमें मर जायेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ ६ ॥

‘मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी मैंने झूठ बात मुँहसे निकाली हो। किसीकी हिंसा की हो अथवा समस्त प्राणियोंमेंसे किसीको भी कभी कष्ट पहुँचाया हो॥ ७ ॥

‘फिर आज किस पापसे मेरा यह बेटा पितृकर्म किये बिना इस बाल्यावस्थामें ही यमराजके घर चला गया॥ ८ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें तो अकाल-मृत्युकी ऐसी भयंकर घटना न पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी॥ ९ ॥

‘निस्संदेह श्रीरामका ही कोऽइ महान् दुष्कर्म है, जिससे इनके राज्यमें रहनेवाले बालकोंकी मृत्यु होने लगी॥ १० ॥