श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘दूसरे राज्यमें रहनेवाले बालकोंको मृत्युसे भय नहीं है; अतः राजन्! मृत्युके वशमें पड़े हुए इस बालकको जीवित कर दो, नहीं तो मैं अपनी स्त्रीके साथ इस राजद्वारपर अनाथकी भाँति प्राण दे दूँगा। श्रीराम! फिर ब्रह्महत्याका पाप लेकर तुम सुखी होना॥ ११-१२ ॥
‘महाबली नरेश! हम तुम्हारे राज्यमें बड़े सुखसे रहे हैं, इसलिये तुम अपने भाइयोंके साथ दीर्घजीवी होओगे॥ १३ ॥
‘श्रीराम! तुम्हारे अधीन रहनेवाले हमलोगोंपर यह बालक-मरणरूपी दुःख सहसा आ पड़ा है, जिससे हम स्वयं भी कालके अधीन हो गये हैं; अतः तुम्हारे इस राज्यमें हमें थोड़ा-सा भी सुख नहीं मिला॥ १४ ॥
‘महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंका यह राज्य अब अनाथ हो गया है। श्रीरामको स्वामीके रूपमें पाकर यहाँ बालकोंकी मृत्यु अटल है॥ १५ ॥
‘राजाके दोषसे जब प्रजाका विधिवत् पालन नहीं होता, तभी प्रजावर्गको ऐसी विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है। राजाके दुराचारी होनेपर ही प्रजाकी अकाल-मृत्यु होती है॥ १६ ॥
‘अथवा नगरों तथा जनपदोंमें रहनेवाले लोग जब अनुचित कर्म—पापाचार करते हैं और वहाँ रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं होती, उन्हें अनुचित कर्मसे रोकनेके लिये कोई उपाय नहीं किया जाता, तभी देशकी प्रजामें अकाल-मृत्युका भय प्राप्त होता है॥ १७ ॥
‘अतः यह स्पष्ट है कि नगर या राज्यमें कहीं राजासे ही कोई अपराध हुआ होगा; तभी इस तरह बालककी मृत्यु हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है’॥
इस तरह अनेक प्रकारके वाक्योंसे उसने बारम्बार राजाके सामने अपना दुःख निवेदन किया और बारम्बार शोकसे संतप्त होकर वह अपने मरे हुए पुत्रको उठा-उठाकर हृदयसे लगाता रहा॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७३॥