भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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चौहत्तरवाँ सर्ग

नारदजीका श्रीरामसे एक तपस्वी शूद्रके अधर्माचरणको ब्राह्मण-बालककी मृत्युमें कारण बताना

महाराज श्रीरामने उस ब्राह्मणका इस तरह दुःख और शोकसे भरा हुआ वह सारा करुण-क्रन्दन सुना॥ १ ॥

इससे वे दुःखसे संतप्त हो उठे। उन्होंने अपने मन्त्रियोंको बुलाया तथा वसिष्ठ और वामदेवको एवं महाजनोंसहित अपने भाइयोंको भी आमन्त्रित किया॥ २ ॥

तदनन्तर वसिष्ठजीके साथ आठ ब्राह्मणोंने राजसभामें प्रवेश किया और उन देवतुल्य नरेशसे कहा—‘महाराज! आपकी जय हो’॥ ३ ॥

उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं—मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम तथा नारद॥ ४ ॥

इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम आसनोंपर बैठाया गया। वहाँ पधारे हुए उन महर्षियोंको श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और वे स्वयं भी अपने स्थानपर बैठ गये॥ ५ ॥

फिर मन्त्री और महाजनोंके साथ यथायोग्य शिष्टाचारका उन्होंने निर्वाह किया। उद्दीप्त तेजवाले वे सब लोग जब यथास्थान बैठ गये, तब श्रीरघुनाथजीने उनसे सब बातें बतायीं और कहा—‘यह ब्राह्मण राजद्वारपर धरना दिये पड़ा है’॥ ६ १/२ ॥

ब्राह्मणके दुःखसे दुःखी हुए उन महाराजका यह वचन सुनकर अन्य सब ऋषियोंके समीप स्वयं नारदजीने यह शुभ बात कही—॥ ७ १/२ ॥

‘राजन्! जिस कारणसे इस बालककी अकाल-मृत्यु हुई है, वह बताता हूँ, सुनिये। रघुकुलनन्दन नरेश! मेरी बात सुनकर जो उचित कर्तव्य हो उसका पालन कीजिये॥ ८ १/२ ॥

‘राजन्! पहले सत्ययुगमें केवल ब्राह्मण ही तपस्वी हुआ करते थे। महाराज! उस समय ब्राह्मणेतर मनुष्य किसी तरह तपस्यामें प्रवृत्त नहीं होता था॥ ९ १/२ ॥

‘वह युग तपस्याके तेजसे प्रकाशित होता था। उसमें ब्राह्मणोंकी ही प्रधानता थी। उस समय अज्ञानका वातावरण नहीं था। इसलिये उस युगके सभी मनुष्य अकाल-मृत्युसे रहित तथा त्रिकालदर्शी होते थे॥ १० १/२ ॥