श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2557, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्तासीवाँ सर्ग
श्रीरामका लक्ष्मणको राजा इलकी कथा सुनाना—इलको एक-एक मासतक स्त्रीत्व और पुरुषत्वकी प्राप्ति
लक्ष्मणकी कही हुई यह बात सुनकर बातचीतकी कलामें निपुण महातेजस्वी श्रीरघुनाथजी हँसते हुए बोले—॥ १ ॥
‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! वृत्रासुरका सारा प्रसंग और अश्वमेध-यज्ञका जो फल तुमने जैसा बताया है, वह सब उसी रूपमें ठीक है॥ २ ॥
‘सौम्य! सुना जाता है कि पूर्वकालमें प्रजापति कर्दमके पुत्र श्रीमान् इल बाह्लीक देशके राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा नरेश थे॥ ३ ॥
‘पुरुषसिंह! वे महायशस्वी भूपाल सारी पृथ्वीको वशमें करके अपने राज्यकी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे॥ ४ ॥
‘सौम्य! रघुनन्दन! परम उदार देवता, महाधनी दैत्य तथा नाग, राक्षस, गन्धर्व और महामनस्वी यक्ष— ये सब भयभीत होकर सदा राजा इलकी स्तुति-पूजा करते थे तथा उन महामना नरेशके रुष्ट हो जानेपर तीनों लोकोंके प्राणी भयसे थर्रा उठते थे॥ ५-६ ॥
‘ऐसे प्रभावशाली होनेपर भी बाह्लीकदेशके स्वामी महायशस्वी परम उदार राजा इल धर्म और पराक्रममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहते थे और उनकी बुद्धि भी स्थिर थी॥ ७ ॥
‘एक समयकी बात है सेवक, सेना और सवारियोंसहित उन महाबाहु नरेशने मनोरम चैत्रमासमें एक सुन्दर वनके भीतर शिकार खेलना आरम्भ किया॥ ८ ॥
‘राजाने उस वनमें सैकड़ों-हजारों हिंसक जन्तुओंका वध किया, किंतु इतने ही जन्तुओंका वध करके उन महामनस्वी नरेशको तृप्ति नहीं हुई॥ ९ ॥
‘फिर उन महामना इलके हाथसे नाना प्रकारके दस हजार हिंसक पशु मारे गये। तत्पश्चात् वे उस प्रदेशमें गये, जहाँ महासेन (स्वामी कार्तिकेय)-का जन्म हुआ था॥ १० ॥
‘उस स्थानमें देवताओंके स्वामी दुर्जय देवता भगवान् शिव अपने समस्त सेवकोंके साथ रहकर गिरिराजकुमारी उमाका मनोरञ्जन करते थे॥ ११ ॥