श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘जिनकी ध्वजापर वृषभका चिह्न सुशोभित होता है, वे भगवान् उमावल्लभ अपने-आपको भी स्त्रीरूपमें प्रकट करके देवी पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे वहाँके पर्वतीय झरनेके पास उनके साथ विहार करते थे॥ १२ ॥
‘उस वनके विभिन्न भागोंमें जहाँ-जहाँ पुँल्लिङ्ग नामधारी जन्तु अथवा वृक्ष थे, वे सब-के-सब स्त्रीलिङ्गमें परिणत हो गये थे॥ १३ ॥
‘वहाँ जो कुछ भी चराचर प्राणियोंका समूह था, वह सब स्त्रीनामधारी हो गया था। इसी समय कर्दमके पुत्र राजा इल सहस्रों हिंसक पशुओंका वध करते हुए उस देशमें आ गये॥ १४ १/२ ॥
‘वहाँ आकर उन्होंने देखा, सर्प, पशु और पक्षियोंसहित उस वनका सारा प्राणिसमुदाय स्त्रीरूप हो गया है। रघुनन्दन! सेवकोंसहित अपने-आपको भी उन्होंने स्त्रीरूपमें परिणत हुआ देखा॥ १५ १/२ ॥
‘अपनेको उस अवस्थामें देखकर राजाको बड़ा दुःख हुआ। यह सारा कार्य उमावल्लभ महादेवजीकी इच्छासे हुआ है, ऐसा जानकर वे भयभीत हो उठे॥ १६ १/२ ॥
‘तदनन्तर सेवक, सेना और सवारियोंसहित राजा इल जटाजूटधारी महात्मा भगवान् नीलकण्ठकी शरणमें गये’॥ १७ १/२ ॥
तब पार्वतीदेवीके साथ विराजमान वरदायक देवता महेश्वर हँसकर प्रजापतिपुत्र इलसे स्वयं बोले—॥ १८ १/२ ॥
‘कर्दमकुमार महाबली राजर्षे! उठो-उठो। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सौम्य नरेश! पुरुषत्व छोड़कर जो चाहो, वह वर माँग लो’॥ १९ १/२ ॥
महात्मा भगवान् शङ्करके इस प्रकार पुरुषत्व देनेसे इनकार कर देनेपर स्त्रीरूप हुए राजा इल शोकसे व्याकुल हो गये। उन्होंने उन सुरश्रेष्ठ महादेवजीसे दूसरा कोई वर नहीं ग्रहण किया॥ २० १/२ ॥
तदनन्तर महान् शोकसे पीड़ित हो राजाने गिरिराजकुमारी उमादेवीके चरणोंमें सम्पूर्ण हृदयसे प्रणाम करके यह प्रार्थना की—‘सम्पूर्ण वरोंकी अधीश्वरी देवि! आप मानिनी हैं। समस्त लोकोंको वर देनेवाली हैं। देवि! आपका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता। अतः आप अपनी सौम्य दृष्टिसे मुझपर अनुग्रह कीजिये’॥