भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पञ्चानबेवाँ सर्ग

श्रीरामका सीतासे उनकी शुद्धता प्रमाणित करनेके लिये शपथ करानेका विचार

इस प्रकार श्रीरघुनाथजी ऋषियों, राजाओं और वानरोंके साथ कॆंइ दिनोंतक वह उत्तम रामायण-गान सुनते रहे॥ १ ॥

उस कथासे ही उन्हें यह मालूम हुआ कि ‘कुश और लव दोनों कुमार सीताके ही सुपुत्र हैं।’ यह जानकर सभाके बीचमें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीने शुद्ध आचारविचार वाले दूतोंको बुलाया और अपनी बुद्धिसे विचारकर कहा—‘तुमलोग यहाँसे भगवान् वाल्मीकि मुनिके पास जाओ और उनसे मेरा यह संदेश कहो॥ २-३ ॥

‘यदि सीताका चरित्र शुद्ध है और यदि उनमें किसी तरहका पाप नहीं है तो वे आप महामुनिकी अनुमति ले यहाँ आकर जनसमुदायमें अपनी शुद्धता प्रमाणित करें’॥ ४ ॥

‘तुम इस विषयमें महर्षि वाल्मीकि तथा सीताके भी हार्दिक अभिप्रायको जानकर शीघ्र मुझे सूचित करो कि क्या वे यहाँ आकर अपनी शुद्धिका विश्वास दिलाना चाहती हैं॥ ५ ॥

‘कल सबेरे मिथिलेशकुमारी जानकी भरी सभामें आवें और मेरा कलंक दूर करनेके लिये शपथ करें’॥

श्रीरघुनाथजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर दूत उस बाड़ेमें गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकि विराजमान थे॥ ७ ॥

महात्मा वाल्मीकि अमित तेजस्वी थे और अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे थे। उन दूतोंने उन्हें प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीके वचन मधुर एवं कोमल शब्दोंमें कह सुनाये॥ ८ ॥

उन दूतोंकी वह बात सुनकर और श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको समझकर वे महातेजस्वी मुनि इस प्रकार बोले-॥९ ॥

‘ऐसा ही होगा, तुमलोगोंका भला हो। श्रीरघुनाथजी जो आज्ञा देते हैं, सीता वही करेगी; क्योंकि पति स्त्रीके लिये देवता है’॥ १० ॥

मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब राजदूत महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीके पास लौट आये। उन्होंने मुनिकी कही हुॆंइ सारी बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं॥ ११ ॥