श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2587, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्ठानबेवाँ सर्ग
सीताके लिये श्रीरामका खेद, ब्रह्माजीका उन्हें समझाना और उत्तरकाण्डका शेष अंश सुननेके लिये प्रेरित करना
विदेहकुमारी सीताके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर श्रीरामके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण वानर तथा ऋषि-मुनि कहने लगे—‘साध्वी सीते! तुम धन्य हो’॥ १ ॥
किंतु स्वयं भगवान् श्रीराम बहुत दुःखी हुए। उनका मन उदास हो गया और वे गूलरके दण्डका सहारा लिये खड़े हो सिर झुकाये नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ २ ॥
बहुत देरतक रोकर बारम्बार आँसू बहाते हुए क्रोध और शोकसे युक्त हो श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥
‘आज मेरा मन अभूतपूर्व शोकमें डूबना चाहता है; क्योंकि इस समय मेरी आँखोंके सामनेसे मूर्तिमती लक्ष्मीके समान सीता अदृश्य हो गयीं॥ ४ ॥
‘पहली बार सीता समुद्रके उस पार लङ्कामें जाकर मेरी आँखोंसे ओझल हुईं थीं। किंतु जब मैं वहाँसे भी उन्हें लौटा लाया, तब पृथ्वीके भीतरसे ले आना कौन बड़ी बात है?’॥ ५ ॥
(यों कहकर वे पृथ्वीसे बोले—) ‘पूजनीये भगवति वसुन्धरे! मुझे सीताको लौटा दो; अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाऊँगा। मेरा प्रभाव कैसा है? यह तुम जानती हो॥ ६ ॥
‘देवि! वास्तवमें तुम्हीं मेरी सास हो। राजा जनक हाथमें फाल लिये तुम्हींको जोत रहे थे, जिससे तुम्हारे भीतरसे सीताका प्रादुर्भाव हुआ॥ ७ ॥
‘अतः या तो तुम सीताको लौटा दो अथवा मेरे लिये भी अपनी गोदमें जगह दो; क्योंकि पाताल हो या स्वर्ग, मैं सीताके साथ ही रहूँगा॥ ८ ॥
‘तुम मेरी सीताको लाओ! मैं मिथिलेशकुमारीके लिये मतवाला (बेसुध) हो गया हूँ। यदि इस पृथ्वीपर तुम उसी रूपमें सीताको मुझे लौटा नहीं दोगी तो मैं पर्वत और वनसहित तुम्हारी स्थितिको नष्ट कर दूँगा। सारी भूमिका विनाश कर डालूँगा। फिर भले ही सब कुछ जलमय ही हो जाय’॥ ९-१० ॥
श्रीरघुनाथजी जब क्रोध और शोकसे युक्त हो इस प्रकारकी बातें कहने लगे, तब देवताओंसहित ब्रह्माजीने उन रघुकुलनन्दन श्रीरामसे कहा—॥ ११ ॥