श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सौ ग्यारहवाँ सर्ग
रामायण-काव्यका उपसंहार और इसकी महिमा
(कुश और लव कहते हैं—) महर्षि वाल्मीकिद्वारा निर्मित यह रामायण नामक श्रेष्ठ आख्यान उत्तरकाण्डसहित इतना ही है। ब्रह्माजीने भी इसका आदर किया है॥ १ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीराम पहलेकी ही भाँति अपने विष्णुस्वरूपसे परमधाममें प्रतिष्ठित हुए। उनके द्वारा चराचर प्राणियोंसहित यह समस्त त्रिलोकी व्याप्त है॥ २ ॥
उन भगवान्के पावन चरित्रसे युक्त होनेके कारण देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि सदा प्रसन्नतापूर्वक देवलोकमें इस रामायणकाव्यका श्रवण करते हैं॥ ३ ॥
यह प्रबन्धकाव्य आयु तथा सौभाग्यको बढ़ाता और पापोंका नाश करता है। रामायण वेदके समान है। विद्वान् पुरुषको श्राद्धोंमें इसे पढ़कर सुनाना चाहिये॥ ४ ॥
इसके पाठसे पुत्रहीनको पुत्र और धनहीनको धन मिलता है। जो प्रतिदिन इसके श्लोकके एक चरणका भी पाठ करता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ५ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन पाप करता है, वह भी यदि इसके एक श्लोकका भी नित्य पाठ करे तो वह सारी पापराशिसे मुक्त हो जाता है॥ ६ ॥
इसकी कथा सुनानेवाले वाचकको वस्त्र, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये। वाचकके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट हो जाते हैं॥ ७ ॥
यह रामायण नामक प्रबन्धकाव्य आयुकी वृद्धि करनेवाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ करता है, उसे इस लोकमें पुत्र-पौत्रकी प्राप्ति होती है और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी उसका बड़ा सम्मान होता है॥ ८ ॥
जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो प्रातःकाल, मध्याह्न, अपराह्न अथवा सायंकालमें रामायणका पाठ करता है, उसे कभी कोऽइ दुःख नहीं होता है॥ ९ ॥
(श्रीरघुनाथजीके परमधाम पधारनेके पश्चात्) रमणीय अयोध्यापुरी भी बहुत वर्षोंतक सूनी पड़ी रहेगी। फिर राजा ऋषभके समय यह आबाद होगी॥ १० ॥
प्रचेताके पुत्र महर्षि वाल्मीकिजीने अश्वमेधयज्ञकी समाप्तिके बादकी कथा एवं उत्तरकाण्डसहित रामायण नामक इस ऐतिहासिक काव्यका निर्माण किया है। ब्रह्माजीने भी