श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपैंतालीसवाँ सर्ग
देवताओं और दैत्योंद्वारा क्षीर-समुद्र-मन्थन, भगवान् रुद्रद्वारा हालाहल विषका पान, भगवान् विष्णुके सहयोगसे मन्दराचलका पातालसे उद्धार और उसके द्वारा मन्थन, धन्वन्तरि, अप्सरा, वारुणी, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ तथा अमृतकी उत्पत्ति और देवासुर-संग्राममें दैत्योंका संहार
विश्वामित्रजीकी बातें सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे मुनिसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
‘ब्रह्मन्! आपने गंगाजीके स्वर्गसे उतरने और समुद्रके भरनेकी यह बड़ी उत्तम और अत्यन्त अद्भुत कथा सुनायी॥ २ ॥
‘काम-क्रोधादि शत्रुओंको संताप देनेवाले महर्षे! आपकी कही हुई इस सम्पूर्ण कथापर पूर्णरूपसे विचार करते हुए हम दोनों भाइयोंकी यह रात्रि एक क्षणके समान बीत गयी है॥ ३ ॥
‘विश्वामित्रजी! लक्ष्मणके साथ इस शुभ कथापर विचार करते हुए ही मेरी यह सारी रात बीती है’॥ ४ ॥
तत्पश्चात् निर्मल प्रभातकाल उपस्थित होनेपर तपोधन विश्वामित्रजी जब नित्यकर्मसे निवृत्त हो चुके, तब शत्रुदमन श्रीरामचन्द्रजीने उनके पास जाकर कहा— ॥ ५ ॥
‘मुने! यह पूजनीया रात्रि चली गयी। सुनने योग्य सर्वोत्तम कथा मैंने सुन ली। अब हमलोग सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला त्रिपथगामिनी नदी गंगाजीके उस पार चलें॥ ६ ॥
‘सदा पुण्यकर्ममें तत्पर रहनेवाले ऋषियोंकी यह नाव उपस्थित है। इसपर सुखद आसन बिछा है। आप परमपूज्य महर्षिको यहाँ उपस्थित जानकर ऋषियोंकी भेजी हुई यह नाव बड़ी तीव्र गतिसे यहाँ आयी है’॥ ७ ॥
महात्मा रघुनन्दनका यह वचन सुनकर विश्वामित्रजीने पहले ऋषियोंसहित श्रीराम-लक्ष्मणको पार कराया॥ ८ ॥
तत्पश्चात् स्वयं भी उत्तर तटपर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रहनेवाले ऋषियोंका सत्कार किया। फिर सब लोग गंगाजीके किनारे ठहरकर विशाला नामक पुरीकी शोभा देखने लगे॥ ९ ॥