श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमित कान्तिमान् एवं महातेजस्वी राजर्षि अम्बरीषने तपस्यासे उद्दीप्त होनेवाले महर्षि ऋचीकको प्रणाम किया और उन्हें प्रसन्न करके कहा॥ १२ ॥
पहले तो उन्होंने ऋचीक मुनिसे उनकी सभी वस्तुओंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा, उसके बाद इस प्रकार कहा—‘महाभाग भृगुनन्दन! यदि आप एक लाख गौएँ लेकर अपने एक पुत्रको पशु बनानेके लिये बेचें तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा॥ १३ १/२ ॥
‘मैं सारे देशोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी यज्ञोपयोगी पशु नहीं पा सका। अतः आप उचित मूल्य लेकर यहाँ मुझे अपने एक पुत्रको दे दीजिये’॥ १४ १/२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी ऋचीक बोले— ‘नरश्रेष्ठ! मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रको तो किसी तरह नहीं बेचूँगा’॥ १५ १/२ ॥
ऋचीक मुनिकी बात सुनकर उन महात्मा पुत्रोंकी माताने पुरुषसिंह अम्बरीषसे इस प्रकार कहा—॥ १६ १/२ ॥
‘प्रभो! भगवान् भार्गव कहते हैं कि ज्येष्ठ पुत्र कदापि बेचनेयोग्य नहीं है; परंतु आपको मालूम होना चाहिये जो सबसे छोटा पुत्र शूनक है, वह मुझे भी बहुत ही प्रिय है। अतः पृथ्वीनाथ! मैं अपना छोटा पुत्र आपको कदापि नहीं दूँगी॥ १७-१८ ॥
‘नरश्रेष्ठ! प्रायः जेठे पुत्र पिताओंको प्रिय होते हैं और छोटे पुत्र माताओंको। अतः मैं अपने कनिष्ठ पुत्रकी अवश्य रक्षा करूँगी’॥ १९ ॥
श्रीराम! मुनि और उनकी पत्नीके ऐसा कहनेपर मझले पुत्र शुनःशेपने स्वयं कहा—॥ २० ॥
‘राजपुत्र! पिताने ज्येष्ठको और माताने कनिष्ठ पुत्रको बेचनेके लिये अयोग्य बतलाया है। अतः मैं समझता हूँ इन दोनोंकी दृष्टिमें मझला पुत्र ही बेचनेके योग्य है। इसलिये तुम मुझे ही ले चलो’॥ २१ ॥
महाबाहु रघुनन्दन! ब्रह्मवादी मझले पुत्रके ऐसा कहनेपर राजा अम्बरीष बड़े प्रसन्न हुए और एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रत्नोंके ढेर तथा एक लाख गौओंके बदले शुनःशेपको लेकर वे घरकी ओर चले॥ २२-२३ ॥
महातेजस्वी महायशस्वी राजर्षि अम्बरीष शुनःशेपको रथपर बिठाकर बड़ी उतावलीके साथ तीव्र गतिसे चले॥