श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 337, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनोंमें गर (जहर) के साथ उत्पन्न होगा। अतः कमललोचने! तुम पुत्रके लिये चिन्ता न करो'॥
'वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी। महर्षि च्यवनको नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रमपर लौट आयी। फिर समय आनेपर उसने एक पुत्रको जन्म दिया॥ ३६ ॥
'उसकी सौतने उसके गर्भको नष्ट कर देनेके लिये जो गर (विष) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होनेके कारण वह राजकुमार 'सगर' नामसे विख्यात हुआ॥ ३७ ॥
'सगरके पुत्र असमंज और असमंजके पुत्र अंशुमान् हुए। अंशुमान्के पुत्र दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए॥ ३८ ॥
'भगीरथसे ककुत्स्थ और ककुत्स्थसे रघुका जन्म हुआ। रघुके तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शापसे राक्षस हो गये थे॥ ३९ ॥
'वे ही कल्माषपाद नामसे भी प्रसिद्ध हुए थे। उनसे शङ्खण नामक पुत्रका जन्म हुआ था। शङ्खणके पुत्र सुदर्शन और सुदर्शनके अग्निवर्ण हुए॥ ४० ॥
'अग्निवर्णके शीघ्रग और शीघ्रगके पुत्र मरु थे। मरुसे प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुकसे अम्बरीषकी उत्पत्ति हुई॥
'अम्बरीषके पुत्र राजा नहुष हुए। नहुषके ययाति और ययातिके पुत्र नाभाग थे। नाभागके अज हुए। अजसे दशरथका जन्म हुआ। इन्हीं महाराज दशरथसे ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं॥ ४२-४३ ॥
'इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए राजाओंका वंश आदिकालसे ही शुद्ध रहा है। ये सब-के-सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं॥ ४४ ॥
'नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! इसी इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये मैं आपकी दो कन्याओंका वरण करता हूँ। ये आपकी कन्याओंके योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य। अतः आप इन्हें कन्यादान करें'॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७०॥