श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 338, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंइकहत्तरवाँ सर्ग
राजा जनकका अपने कुलका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये क्रमशः सीता और ऊर्मिलाको देनेकी प्रतिज्ञा करना
महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशका परिचय दे चुके, तब राजा जनकने हाथ जोड़कर उनसे कहा— 'मुनिश्रेष्ठ! आपका भला हो। अब हम भी अपने कुलका परिचय दे रहे हैं, सुनिये। महामते! कुलीन पुरुषके लिये कन्यादानके समय अपने कुलका पूर्णरूपेण परिचय देना आवश्यक है; अतः आप सुननेकी कृपा करें॥ १-२ ॥
'प्राचीन कालमें निमि नामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात थे॥ ३ ॥
'उनके मिथि नामक एक पुत्र हुआ। मिथिके पुत्रका नाम जनक हुआ। ये ही हमारे कुलमें पहले जनक हुए हैं (इन्हींके नामपर हमारे वंशका प्रत्येक राजा 'जनक' कहलाता है)। जनकसे उदावसुका जन्म हुआ॥ ४ ॥
'उदावसुसे धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए। नन्दिवर्धनके शूरवीर पुत्रका नाम सुकेतु हुआ॥ ५ ॥
'सुकेतुके भी देवरात नामक पुत्र हुआ। देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे। राजर्षि देवरातके बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ॥ ६ ॥
'बृहद्रथके पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे। महावीरके सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे॥ ७ ॥
'सुधृतिके भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे। राजर्षि धृष्टकेतुका पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात हुआ॥ ८ ॥
'हर्यश्वके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धकके पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए॥ ९ ॥
'कीर्तिरथके पुत्र देवमीढ नामसे विख्यात हुए। देवमीढके विबुध और विबुधके पुत्र महीध्रक हुए॥ १० ॥